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Khwabo ka jahan by Jitendra kabir

 ख्वाबों का जहां इस जहां से परे न जाने कितने जहां बसते हैं, हर शख्स यहां अपने ख्वाबों का जहां …


 ख्वाबों का जहां

Khwabo ka jahan by Jitendra kabir

इस जहां से परे

न जाने कितने जहां बसते हैं,

हर शख्स यहां

अपने ख्वाबों का जहां लिए फिरता है।

घटती नहीं हैं चीजें जब

इस जहां में उसके हिसाब से

तो ‘ख्वाब-जहां’ में अपनी

दमित इच्छाओं का बहाव लिए फिरता है।

मिले चाहे न मिले उसे

यहां अपने मन का कुछ भी

लेकिन ‘ख्वाब-जहां’ में अपने

कल्पवृक्ष खुद के हजार लिए फिरता है।

मुश्किलें मिलती हैं अक्सर

बहुतायत में यहां हर किसी को

इसलिए ‘ख्वाब-जहां’ में अपनी

सब मुश्किलों का निदान लिए फिरता है।

अपनी नजरों में है हर इंसान

दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण इंसान,

‘ख्वाब-जहां’ में अपनी

वो इसी बात की तस्दीक किए फिरता है।

                                   जितेन्द्र ‘कबीर’

                                   

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


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