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kavita-wo jamana by sudhir srivastav

वो जमाना आज जब अपनेपिताजी की उस जमाने कीबातें याद आती हैं,तो सिर शर्म से झुक जाता है।माँ बाप और …


वो जमाना

kavita-wo jamana by sudhir srivastav


आज जब अपने
पिताजी की उस जमाने की
बातें याद आती हैं,
तो सिर शर्म से झुक जाता है।
माँ बाप और अपने बड़ों से
आँख मिलाने में ही
डर लगता था,
उनकी किसी बात को
नकारने की बात सोचना भी
सपना लगता था।
घर में भी अपने बड़ों के
बराबर बैठना सिर्फ़
सोचना भर था,
अपने लिए कुछ कहना भी
कहाँ हो पाता था।
बस चुपके से धीरे से
अपनी बात दादी, बड़ी माँ या माँ से
कहकर भी खिसकना पड़ता था।
रिश्तों के अनुरूप ही
सबका सम्मान था,
परंतु हर किसी के लिए
हर किसी के मन
खुद से ज्यादा प्यार था।
उस समय दूश्वारियां भी
आज से बहुत ज्यादा थीं,
परंतु प्यार, लगाव, सबकी चिंता
हर किसी के ही मन में
हजार गुना ज्यादा थीं।
आज भी मुझे इसका अहसास है
क्योंकि मैंने भी ऐसा ही
काफी कुछ देखा है,
अपने बाप को बड़े बाप के सामने
सदा खड़े ही जो देखा है।
बच्चे जवान हो गये
मगर बड़े बाप से नजरें मिलाने
बराबर बैठकर बात करने में भी
काँप जाता हाँड है,
बड़ी माँ ही अभी भी
हमारी सूत्रधार हैं।
हमारे बाप हमारे साथ नहीं हैं
पर हमने उनकी सीख को
जिंदा कर रखा है,
परंतु सोचता हूँ आज को देखकर
तो ये सब मात्र किस्सा लगता है।
👉 सुधीर श्रीवास्तव
         गोण्डा, उ.प्र.


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