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kavita vo phir kabhi nhi lauta by mahesh keshari

 कविता.. वो, फिर कभी नहीं लौटा..  सालों पहले, एक  आदमी, हमारे भीतर  से निकला और,  फिर, कभी नहीं लौटा… !!  सुना …


 कविता.. 
वो, फिर कभी नहीं लौटा.. 

सालों पहले, एक 
आदमी, हमारे भीतर 
से निकला और, 
फिर, कभी नहीं लौटा… !! 
सुना है, वो कहीं शहर  , में
जाकर खो गया… !! 
वो, घर, की जरुरतों
को निपटाने
निकला था…
 निपटाते- निपटाते
वो पहले तारीख, बना 
फिर.. कैलेंडर… और, फिर, एक
मशीन बनकर रह गया….. ! ! 
और  , जब मशीन बना तो 
बहुत ही असंवेदनशील और, 
चिड़चिड़ा , हो गया..!! 
हमेशा, हंसता- खिलखिलाता
रहने वाला, वाला आदमी
फिर, कभी नहीं मुस्कुराया..!! 
और, हमेशा, बेवजह 
शोर, करने लगा…
मशीन की तरह…!! 
अब, वो चीजों को केवल 
छू- भर सकता था… !! 
उसने चीजों को महसूसना
बंद कर दिया था.. !!
उसके पास, पैसा था 
और, भूख भी
लेकिन, खाने के लिए 
समय नहीं था… !! 
 
उसके, पास, फल था.. 
लेकिन, उसमें मिठास 
नहीं थी..!! 
उसके पास  , फूल, थें 
लेकिन, उसमें खूशबू 
नहीं थी..!! 
उसकी ग्रंथियाँ, काम के बोझ
से सूख गई थीं… !! 
प्रेम, उसके लिए, 
सबसे  बडा़
बनावटी शब्द बनकर 
रह गया… !!! 
वो, पैसे, बहुत कमा रहा 
था.. !! 
लेकिन,  खुश 
नहीं था…!! 
या, यों कहलें की 
वो पैसे,  से 
खुशियाँ, खरीदना
चाह रहा था… !!! 
बहुत दिन हुए 
उसे, अपने आप से बातें 
किये..!! 
शीशे, को देखकर 
इत्मिनान
से कंघी किये..!! 
या, चौक पर  बैठकर
घंटों अखबार पढ़े और  
चाय, पिये हुए.. 
या, गांव जाकर, महीनों
समय बिताये…!! 
पहले वो आदमी गांव 
के तालाब, में  मछलियाँ 
पकडता था… 
संगी – साथियों के साथ 
घंटों बतकही करता था… !! 
पहले, उसे बतकही करते
हुए… और 
मछली पकड़ते
हुए.. बडा़… आनंद आता.. 
था… !! 
लेकिन, अब, ये, सब  , उसे
बकवास के सिवा
कुछ नहीं लगता… ! ! 
फिर, वो, आदमी दवाईयों
पर, जिंदा रहने लगा…!! 
आखिर, 
कब और कैसे बदल 
गया… हमारे भीतर का  वो..
आदमी..?? 
कभी कोई, शहर जाना 
तो शहर से उस आदमी के 
बारे में जरूर पूछना…!! 
सर्वाधिकार सुरक्षित
महेश कुमार केशरी 
C/ O- मेघदूत मार्केट फुसरो 

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