Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

kavita Sandeh by sudhir srivastav

 संदेह संदेह के बादल एक बार घिर आये, तो सच मानिए कि फिर कभी न छंट पाये,  मान लिया छंट …


 संदेह

kavita Sandeh by sudhir srivastav

संदेह के बादल

एक बार घिर आये,

तो सच मानिए कि

फिर कभी न छंट पाये, 

मान लिया छंट भी गये तो भी

उसके अंश अपनी जगह

कभी अपनी जगह से 

न हिल पाये।

संदेह ऐसा नासूर है

जो लाइलाज है यारों

जो भी इसका शिकार 

हो गया एक बार

मरने के बाद ही

वह इससे मुक्त हो पाये।

◆ सुधीर श्रीवास्तव

      गोण्डा, उ.प्र.

 ©मौलिक, स्वरचित,अप्रकाशित


Related Posts

हार क्यों मान ली जाए?- जितेन्द्र ‘कबीर’

January 6, 2022

हार क्यों मान ली जाए? बुरे से बुरा क्या हो सकता हैहमारे साथ?यही कि हमारी धन – संपत्तिहमारे हाथ से

सफेद आसमां- जितेन्द्र ‘कबीर’

January 6, 2022

सफेद आसमां कड़ाके की सर्दी मेंरजाई का मोह छोड़ पाओ अगरतो निकलो बाहर जराआंगन चौबारे तक, देखो ऊपर!आसमान बरसा रहा

खट्टी मीठी यादें – डॉ इंदु कुमारी

January 6, 2022

खट्टी मीठी यादें आती है मानस पटल परउभरकर वो सुनहरी यादें प्रेम रस में भीगा -भींगामधुरमय स्नेहिल सौगातें जिनकी यादें

नव वर्ष – डॉ. इन्दु कुमारी

January 6, 2022

नव वर्ष नववर्ष तो नववर्ष हैअंग्रेजी हो या हिन्दी मधुमय हो जीवन येनई उल्लास के साथ स्फुरण हो विलक्षण ऐतिहसिक

पैगाम – डॉ. इन्दु कुमारी

January 6, 2022

पैगाम ह्रदय को न बंजर होने देनालगाओ प्रेम के पौधे भी स्नेह से सींच -सींच करकेउगाओ प्रेम वाटिका भी मिली

अजीज मेरे- डॉ. इन्दु कुमारी

January 6, 2022

अजीज मेरे अलविदा ना कहना मुझेदिसम्बर की तरह मुझेआती है जनवरी आयेखुशियाँ भी ढेरों लाएं महकती रहे बगिया तेरीचहकती रहे

Leave a Comment