Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

kavita Prithvi by priya gaud

 “पृथ्वी “ पृथ्वी के उदर पर जो पड़ी हैं दरारें ये प्रमाण है कि वो जन्म चुकी है शिशु इतंजार …


 “पृथ्वी “

kavita Prithvi by priya gaud

पृथ्वी के उदर पर जो पड़ी हैं दरारें

ये प्रमाण है कि वो जन्म चुकी है शिशु

इतंजार में है उस मरहम के

जो भर दे उसकी दरारें

और खिल सके पृथ्वी की कोख़ में

नन्ही नन्ही कोपलें

लौट आए बसंत

फिर खुद पर इतराए जंगल

हरे भरे हो पेड़ औऱ पहाड़

सुनाई दे पंक्षियों का कलरव

और पंख पसारे नाचे मोर

पूरी धरती सजे अपने जन्मे अनगिनत

बच्चों के हर रंग से राग से प्यार से

जिए उसका ख़ुद का बसन्त

जो सौंपा है उसने हमारे हाथ सदियों से…..

-प्रिया गौड़ 


Related Posts

Ab aur na aise satao sanam

February 14, 2021

poem जब से तुझ से  जुड़ा  फूल सा खिल  गया  सूखे  मधुबन में जैसे   कँवल   खिल  गया अकेले  पन  में 

Achhe din

February 8, 2021

 कविताअच्छे दिन बात    महिलाओं      की   सुरक्षा     का       हो या           कुपोषित 

Sach pagli hme tumhi se pyar hai

February 8, 2021

 कविता जब देखता हूं जिधर  देखता हूं  दिख  जाती  हो मोटे मोटे किताबों के काले काले शब्दों में दिख जाती

Har vade par asha kiya na kro

February 8, 2021

 ग़ज़ल हर   वादे   पर   आशा   किया   ना   करो पराधीन    होकर     जिया      ना     करो लगी है

Peele Peele phoolon me ab jakar gungunana hai

February 8, 2021

 ग़ज़ल पीले पीले फूलों में अब जाकर गुनगुनाना हैरोने वाले को हंसाना है सोने वाले को जगाना है समय के

Zindagi me mere aana tera

February 6, 2021

 ग़ज़ल  ज़िन्दगी में मेरे आना तेरा प्यार हर पल मेरा, निभाना तेरा भूल जाऊं मैं कैसे तुझको सनम प्यार गंगा

Leave a Comment