Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

kavita Mukti by virendra pradhan

 मुक्ति किसी डांट-डपट से बेपरवाह हो मन चाहता है खेलना मनमफिक़ खेल जो बन्धे न हों बहुत अनुशासन मेँ परे …


 मुक्ति

kavita Mukti by virendra pradhan

किसी डांट-डपट से बेपरवाह हो

मन चाहता है खेलना मनमफिक़ खेल

जो बन्धे न हों बहुत अनुशासन मेँ

परे हों कड़े नियमों से।

मन बहुत देर तक अंदर न थमता

और बहुत देर तक बाहर न रमता

समेट लेना चाहता है अचानक विस्तार को

सीमा के अंदर

उस विस्तार को जो हुआ था लगातार मगर धीरे-धीरे।

अंदर जो जाता हूँ अक्सर यह पाता हूं 

कि धूल,मिट्टी के दाग -धब्बों के रूप मे

अपने नहीं वरन मेरे ही पैरों से 

अंदर घुस आता है बाहर भी

जो किसी कोने मेँ छुप पसर जाना चाहता है

पूरा ही पूरे मेँ।

खटकने,अटकने या भटकने के बजाय

इन दाग,धब्बों को मिटाने की 

और बाहर को बाहर धकेल भगाने की

तथा अन्तर को साफ-सुथरा बनाने की

लगातार चलने वाली प्रक्रिया ही तो है मुक्ति।

-वीरेंद्र प्रधान


Related Posts

कविता -आधा

September 1, 2022

कविता -आधा जब भी इस दुनिया से मैं खुद को साझा करता हूँमानो लगता है मुझको के खुद को आधा

कविता – उलझ जाता हूँ मैं

September 1, 2022

कविता – उलझ जाता हूँ मैं किसी से बात कहनी होकिसी की बात सुननी होमानवता और मुझमें सेअगर मेरी जात

पर्यावरण संरक्षण

September 1, 2022

पर्यावरण संरक्षण अद्भुत सी सुंदरता है पर्यावरण में,चलो हम भी लाए, कुछ जिम्मेदारियां हमारे आचरण में,क्यों फैला रखा है हमने

अंतिम संदेश।(Last message)

August 31, 2022

अंतिम संदेश। जिंदगी का क्या भरोसा,कब हमारा आखरी पल हो,कभी खुद को तो कभी लोगों को कोसा,पर कौन जाने कि

कविता –प्रेम( प्रेम पर कविता)

August 30, 2022

कविता –प्रेम ( प्रेम पर कविता) प्रेम शब्द जब युवाओं के सामने आया बस प्रेमिका का खुमार दिल दिमाग में

एहसास एक लड़की के

August 30, 2022

“एहसास एक लड़की के” दुनिया मेरे लिए ख़ौफ़ की बिहड़ नगरी है,अंधेरों से नहीं मुझे उजालों से डर लगता है,

PreviousNext

Leave a Comment