Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

kavita banabatta by dr hare krishna

 बाणभट्ट बाणभट्ट की विद्वता का भूषण को उपहार मिला है पिता पुत्र की रचनाओं पर लिखने का अधिकार नहीं है …


 बाणभट्ट

kavita banabatta by dr hare krishna

बाणभट्ट की विद्वता का

भूषण को उपहार मिला है

पिता पुत्र की रचनाओं पर

लिखने का अधिकार नहीं है ।।

कहते हैं कादंबरी उनकी,

रचनाओं में बहुत श्रेष्ठ है,

अध्ययन मेरा बहुत अल्प है

अनुशीलन करने का मन है  ।।

विषय वस्तु का ज्ञान अल्प है

फिर भी उसकी गहराई में,

झांक सकूं  मन कहता है,

बाणभट्ट को नमन है मेरा। ।।

कादंबरी के अंतर स्थल में,

कितना गहरा प्रेम छुपा है,

कहना पड़ा किसी ज्ञानी को

वहां कोई क्या तरुणी है?

विद्वानों में होड़ मची थी,

अनुशीलन भी उनका था

वाणी की व्यापकता पर

शब्द ध्वनि सुंदरता पर  ।।

कहने  लगे सभी मिलकर,

नहीं नहीं वाणी बाणस्य ,

रचना बिल्कुल अद्भुत है

भूषण भट्ट संयोजक हैं।   ।।

साहित्य तो एक दर्पण है,

हम सब उसके अनुचर हैं,

अनुशीलन की क्षमता जितनी,

दर्शन बांटा करते हैं।    ।।

कादंबरी की रचना पर,

कविवर का कैसा संघर्ष,

जीवन में आया होगा,

निर्णय उनका अपना था।  ।।

बाणभट्ट की चिंता थी,

कादंबरी की पूर्णता की

अपने पुत्र को आदेशित कर

भार मुक्त हुए होंगे।     ।।

जीवन की लीला कैसी है,

कलम कहां बंध जायेगी  ,

बाणभट्ट की अपनी इच्छा

कितना अहम रही होगी   ?

   डॉ हरे कृष्ण मिश्र

     बोकारो स्टील सिटी

     झारखंड ।


Related Posts

कविता-हार और जीत जितेन्द्र कबीर

June 1, 2021

हार और जीत ‘हार’ भले ही कर ले इंसान कोकुछ समय के लिए ‘निराश’लेकिन वो मुहैया करवाती है उसकोअपने अंतर्मन

kavita barkha shweta tiwari Mp.

June 1, 2021

बरखा बरखा रानी आओ ना  बूंद बूंद बरसाओ ना तपती धरती का व्याकुल अंतर्मन  क्षुब्ध दुखी सबका जीवन  शीतल स्पर्श

kavita vaqt by anita sharma jhasi

June 1, 2021

वक्त जुबां से आह निकली थी,लबों पे उदासी थी।क्या सोचा था,क्या पाया है,मन में उदासी थी। कभी ईश्वर से नाराजगी

kavita Bebasi by Namita Joshi

May 31, 2021

  बेबसी हर सूं पसरा है सन्नाटा, हर निगाह परेशान क्यूँ है। गुलजा़र था जो मैदान कभी कहकहों से, आज

kavita purane panne by Anita sharma

May 31, 2021

पुराने पन्ने चलो पुराने पन्नों को पलटाये,फिर उन पन्नों को सी लेते हैं।उसमें दबे अरमानो में से ही,कुछ अरमान जीवन्त

kavita shahar by Ajay jha

May 31, 2021

शहर. मैं शहर हूँ बस्तियों की परिधि में बसा मजबूर मजलूम पलायित नि:सरित श्रम स्वेद निर्मित अभिलाषा लिए अतीत का

Leave a Comment