Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

kavita anubandh by dr hare krishna mishra

 अनुबंध परंपरागत अनुबंध हमारा, कब टूटेगा था ज्ञात नहीं , सहज सरल जीवन जिया है हमको है अभिमान  नहीं।   ।। …


 अनुबंध

kavita anubandh by dr hare krishna mishra

परंपरागत अनुबंध हमारा,

कब टूटेगा था ज्ञात नहीं ,

सहज सरल जीवन जिया है

हमको है अभिमान  नहीं।   ।।

सुखद कामना मंगलमय जीवन 

सबको हो अधिकार यही ,

मिला हमें भी ऐसा जीवन

उसका भी है ज्ञात मुझे।   ।।

जीवन का अनुशीलन करना

सुख दुख का अभिनंदन करना,

जीने का भी अर्थ रहा है  ,

कभी नहीं तोड़ा अनुबंध  ।।

संस्कृति हमारी सभ्यता अपनी,

शालीन बना अपना जीवन

जीवन की छोटी नौका ले

पाया अपना जीवन तट।    ।।

सौंदर्य  भरा पावन निश्छल ,

चौवन वसंत आया हमतक

गिन गिन कर अपने जीवन में,

स्वागत करता था हरदम   ।।

जीवन के सुनेपन को भी,

हंस हंस कर सहलाया था,

भक्ति भाव से ओतप्रोत थे

अपने जीवन पनघट पर ।।

गुथियों को  सुलझा ने में,

सदा साथ तू देती थी,

कभी भी छाते दुख के बादल

सहज सरल छंट जाते थे।   ।।

मिलजुल कर हम जीवन जीना,

सीख लिया था संग संग में ,

कैसे भूल हुई कहां पर ,

बिछड़ गए अपने पथ पर।   ।।

गिला शिकवा करूं मैं किससे

मेरे भाग्य में जो भी था। 

आंसू के घूंट पी पी कर,

दर्द भरे गीतों को गा   ।।

         तथास्तु,,,,, डॉ हरे कृष्ण मिश्र


Related Posts

Bharat varsh by arun kumar shukla

June 27, 2021

 शीर्षक- भारत वर्ष मस्तक दिव्य हिमालय जिसका, पांव धुले नितसागर इसका। हृदय भाग में बहती है नित , गंगा यमुना

karm hi Ishwar by kamal siwani bihar

June 27, 2021

                      कर्म ही ईश्वर   क्या ईश्वर  मिलता  है  हमको ,

kavita Sandeh by sudhir srivastav

June 27, 2021

 संदेह संदेह के बादल एक बार घिर आये, तो सच मानिए कि फिर कभी न छंट पाये,  मान लिया छंट

bihadon ki bandook by priya gaud

June 27, 2021

 “बीहड़ों की बंदूक” बीहड़ों में जब उठती हैं बंदूकें दागी जाती हैं गोलियां उन बंदूकों की चिंगारी के बल पर

Rajdaar dariya by priya gaud

June 27, 2021

 राज़दार दरिया दरिया  सबकी मुलाकातों की गवाह रहती है कुछ पूरी तो कुछ अधूरी किस्सों की राजदार रहती है आँखे

sawam ki rachyita by priya gaud

June 27, 2021

 “स्वयं की रचयिता” तुम्हारी घुटती हुई आत्मा का शोर कही कैद न हो जाये उलाहनों के शोर में इसलिए चीखों

1 thought on “kavita anubandh by dr hare krishna mishra”

Leave a Comment