Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

kavita abhilasha by anita sharma

अभिलाषा जब प्राण तन से निकले, तब पास तुम ही रहना। आँखे मेरी खुली हो, पलकें तुम ही बंद करना। …


अभिलाषा

जब प्राण तन से निकले,
तब पास तुम ही रहना।
आँखे मेरी खुली हो,
पलकें तुम ही बंद करना।
देना विदा मुझे तुम ,
न अश्रुधार बहाना।
सोलह शृंगार करके,
दुल्हन सी मुझे सजाना।
अग्नि मेरी चिता को,
तुम कर कमलों से देना।
समय के साथ जीवन,
अपना तुम सजाना।
जब प्राण तन से निकले,
तब आस पास ही रहना।
अलविदा हर रिश्तों से,
कह पिण्डदान करना।
अस्थियों को मेरी,
गंगा में तुम बहाना।
फिर याद न मुझे तुम,
जीवन में फिर करना।
अनिता शर्मा झाँसी
स्वमौलिक रचना


Related Posts

Bharat varsh by arun kumar shukla

June 27, 2021

 शीर्षक- भारत वर्ष मस्तक दिव्य हिमालय जिसका, पांव धुले नितसागर इसका। हृदय भाग में बहती है नित , गंगा यमुना

karm hi Ishwar by kamal siwani bihar

June 27, 2021

                      कर्म ही ईश्वर   क्या ईश्वर  मिलता  है  हमको ,

kavita Sandeh by sudhir srivastav

June 27, 2021

 संदेह संदेह के बादल एक बार घिर आये, तो सच मानिए कि फिर कभी न छंट पाये,  मान लिया छंट

bihadon ki bandook by priya gaud

June 27, 2021

 “बीहड़ों की बंदूक” बीहड़ों में जब उठती हैं बंदूकें दागी जाती हैं गोलियां उन बंदूकों की चिंगारी के बल पर

Rajdaar dariya by priya gaud

June 27, 2021

 राज़दार दरिया दरिया  सबकी मुलाकातों की गवाह रहती है कुछ पूरी तो कुछ अधूरी किस्सों की राजदार रहती है आँखे

sawam ki rachyita by priya gaud

June 27, 2021

 “स्वयं की रचयिता” तुम्हारी घुटती हुई आत्मा का शोर कही कैद न हो जाये उलाहनों के शोर में इसलिए चीखों

Leave a Comment