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poem, Rakesh madhur

Kashmir par kavita | कश्मीर पर कविता

अपना कश्मीर और मधुकवि अब तो सोए हुए भारती जाग जा|| देखले अपने भारत की क्या है दशा|| आज हिन्सा …


अपना कश्मीर और मधुकवि

Kashmir par kavita | कश्मीर पर कविता
अब तो सोए हुए भारती जाग जा||
देखले अपने भारत की क्या है दशा||
आज हिन्सा अहिंसा को डसने लगी||
करुणा कश्मीर में अब सिसकने लगी||
कर दे आबाद अब आज कश्मीर को,
अग्निवीरों की नव बस्तियां दे बसा||
अब तो सोए हुए भारती जाग जा||
भारतीयों की ए सभ्यता ही नहीं||
अपने भारत सी न भव्यता है कहीं||
चोट करता कोई क्रूर आदर्श पर,
दागकर गोलियां लूटता अस्मिता||
अब तो सोए हुए भारती जाग जा||
हैं अमन चैन के दुश्मनों का हुजूम||
मौन जाने है क्यों आज दारुल उलूम||
आज ओबैसी  की बोलती बंद है,
बोल कुछ बोल कश्मीर कब किस का था||
अब तो सोए हुए भारती जाग जा||
शान्त सैतान होते नहीं प्यार से||
काट दो गर्दनें तेग तलवार से||
सिर्फ सेनानियों को ही कश्मीर है,
क्योंकि आतंकियों की  यहाँ अधिकता ||
अब तो सोए हुए भारती जाग जा||

About author 

Madhukavi Rakesh madhur

मधुकवि राकेश मधुर

गांव-चाबरखास
तहसील–तिलहर
जनपद-शाहजहांपुर यू पी


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