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karm hi Ishwar by kamal siwani bihar

                      कर्म ही ईश्वर   क्या ईश्वर  मिलता  है  हमको , …


                      कर्म ही ईश्वर 

karm hi Ishwar by kamal siwani bihar

 क्या ईश्वर  मिलता  है  हमको , अंग  भभूत  रमाने  में ?
 क्या ईश्वर मिलता है हमको , हठ का योग अपनाने में ?
 ईश्वर मिलता  हमें  कदाचित , ढोल – मृदंग  बजाने  में ?
 ईश्वर मिलता  हमें  कहाँ  कब ,  ऊँचे  स्वर  में गाने  में ?
 ईश्वर ने  कब  हमें  बताया , जा  निष्क्रिय  बन  जाओ ?
 कर्म – धर्म सारे छोड़ अपने ,  नाम  मेरा  बस  गाओ ?
 केवल  नाम   रटन   में   ही  बस ,  सारे  दिन   कटेंगे  ?
 जीने  हेतु   भोजन  –  पानी ,  किसके   किए   मिलेंगे ?
 भौतिक साधन जिनके बल पर , जीवन यह पलता है ।
 बिन उसके कोई भी प्राणी , एक  पग  ना  चलता  है ।।
 उन्हें  लाकर  बोलो  हमको ,  कौन  खरीदकर   देगा  ?
 उसके  बदले   हमसे   कोई ,  कुछ  भी  ना  वो  लेगा ?
 अगर  दिया    उसका   लेंगे  तो ,  पौरुष  हममें  होगा ?
 सोचें अपना आतम बल तब , जरा भी मुखरित होगा  ?
 ईश्वर  ने   है   हमें   बनाया   ,  कर्म  यहाँ  करने   को  ।
 ना  कि  केवल  योगी  बनकर  , भू  पर  विचरने  को ।।
 हाथ – पाँव ये  मिले  हैं  हमको ,  केवल  धूनि  रमाने  ?
 नाम  लेकर  ईश्वर  का  केवल ,   भक्ति   के  पद गाने ?
 इसी  ढर्रे   पर  सब  प्राणी  जन ,  चलने  अगर  लगेंगे ।
 फिर  तो  सारे  काज  जगत  के ,  कैसे  भला  चलेंगे  ?
 छोड़कर  सारी    अकर्मण्यता ,  ज्ञान    यही  अपनाएँ ।
 कर्म ही ईश्वर अखिल जगत में , उसी में  उसको  पाएँ ।।                                
         — कमल सीवानी ,रामगढ़ , सीवान ,बिहार

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