Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Jivan ki bhul by Sudhir Srivastava

 जीवन की भूल माना कि भूल होना मानवीय प्रवृत्ति है जो हम भी स्वीकारते हैं । मगर अफसोस होता है …


 जीवन की भूल

Jivan ki bhul by Sudhir Srivastava

माना कि भूल होना

मानवीय प्रवृत्ति है

जो हम भी स्वीकारते हैं ।

मगर अफसोस होता है

जब माँ बाप की उपेक्षाओं

उनकी बेकद्री को भी हम

अपनी भूल ही ठहराते हैं,

वर्तमान परिवेश की आड़ में

उनको गँवार कहते हैं,

सूटबूट में आज हम तो

माँ बाप की अपनी पसंद की खातिर

अपने यार,दोस्तों के बीच

माँ बाप कहने में भी शरमाते हैं।

बात इतनी सी ही होती तो

और बात थी,

देहाती, गँवार मान अब तो

माँ बाप के साथ कहीं

आने जाने से भी कतराते हैं।

जिनकी बदौलत और 

खून पसीने की कमाई से

आज के समाज में हम

घमंड से सिर उठाते हैं,

बस यहीं भूल जाते हैं,

अपने संस्कार बिना परिश्रम

हम अपने बच्चों को सिखाते हैं,

आज हम माँ बाप को 

उपेक्षित करते हैं,

कल अपने बच्चों से 

चार कदम और आगे जाकर

उपेक्षित होते हैं।

जानबूझकर की गई भूलों को

याद करते और पछताते हैं,

क्योंकि अगली पीढ़ी की 

नजर में हम आज

गँवार बन जाते हैं,

जीवन में जाने,अंजाने 

भूलों को यादकर पछताते हैं,

तब संसार छोड़ चुके 

अपने गँवार, देहाती माँ बाप

बहुत याद आते हैं।

✍ सुधीर श्रीवास्तव

       गोण्डा, उ.प्र.

    8115285921

©मौलिक, स्वरचित


Related Posts

कविता-हमें लोकतंत्र न्याय बंधुत्व की सामूहिक विरासत मिली/Loktantra par kavita

October 22, 2022

कविता-हमें लोकतंत्र न्याय बंधुत्व की सामूहिक विरासत मिली हम अत्यंत सौभाग्यशाली हैं हमारी किस्मत खुली अहिंसात्मक सोच सच्चे उपयोग की

प्रकाश पर्व दीपावली की बधाईयां/Deepawali par kavita

October 22, 2022

 कविता -प्रकाश पर्व दीपावली की बधाईयां प्रकाश पर्व दीपावली की बधाई  पारंपरिक हर्ष और उत्साह लेकर आई  राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ने

इस धरा पर…. ” (कविता…)

October 19, 2022

नन्हीं कड़ी में…. आज की बात “इस धरा पर…. ” (कविता…) सूरज की पहली किरण से,जैसे जगमग होता ये संसार।दीपों

ये ना समझो पाठकों

October 19, 2022

अरे ! लोग कहते जख़्मी दिल जिसकावही तो दर्द-ए शायर/शायरा होता है।।ज़ख़्मी दिल रोए उसका ज़ार-ज़ार जबतब कलम का हर

धनतेरस के दिन मैंने अपनी मां को खोया

October 19, 2022

धनतेरस 2020 के दिन मैं अपनी मां के साथ बैठा था अचानक उसे साइलेंट अटैक आया और मेरी नजरों के

पता नहीं क्यों

October 17, 2022

कविता –पता नहीं क्यों मुझे घर का कोइ एक सख्श याद नहीं आता। मुझे याद आता है वो भाव, वो

PreviousNext

Leave a Comment