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Jhoothon ka hai jamana by Jitendra Kabir

 झूठों का है जमाना एक बार झूठ बोल कर उसे छुपाने के लिए झूठ पर झूठ बोलते जाना, पकड़े भी …


 झूठों का है जमाना

Jhoothon ka hai jamana by Jitendra Kabir

एक बार झूठ बोल कर

उसे छुपाने के लिए

झूठ पर झूठ बोलते जाना,

पकड़े भी गये जो कभी तो

शर्मिंदगी का पात्र बन जाना,

पकड़े नहीं गये जो तो भी उम्र भर

भांडा फूटने के डर से

मन ही मन डरते जाना,

इस डर के कारण ही

दिन का चैन, रातों की नींद

किश्तों की तरह भरते जाना,

फिर भी कहां छोड़ पाते हैं

हम लोग

खुद झूठ बोलना और दूसरों से

झूठ बुलवाते जाना,

काम निकालने के लिए अपना

झूठी तारीफें करते जाना,

अहम की संतुष्टि के लिए अपनी

झूठी तारीफें सुनते जाना,

बुराई करना पीठ के पीछे

सामने कसीदे पढ़ते जाना,

गाली देना मन ही मन में

मुंह पे गुणगान ही करते जाना,

जल-भुन राख हो जाना मन में

सामने बधाई उड़ेलते जाना,

कहां छोड़ पाते हैं हम

खुद झूठ बोलना और दूसरों से

झूठ बुलवाते जाना।

                         जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


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