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Hijab by Ajay Kumar jha.

 हिजाब. खाली जेबों की कसी मुट्ठियाँ हवा में लहराने को उतर आई है अरण्य में खिलते अग्निपुष्प से रंगे  सियार …


 हिजाब.

Hijab  by Ajay Kumar jha

खाली जेबों की कसी मुट्ठियाँ

हवा में लहराने को उतर आई है

अरण्य में खिलते अग्निपुष्प से

रंगे  सियार बेरंग होने लगे हैं

जुमलों की धूलें उड़ने लगी है

खिजाबी हिजाब दिखने लगे हैं

फटी ऐंड़ियों के रिसते लहू से

लिखी इबारतें उभड़ने लगी है 

सियासती चूलें हिलने लगी है

मलबों में दबी महलों की चीख

संसदीय समर में गुंजने लगी है

पिघलते पीड़ के नि:सरित नीर 

जमीनी हकीकत को मथ रही है

कीचड़ में कदवा करते गाँव अब

शहरों को चहुँ दिश घेरने लगी है.             ++++++++++++++++++++

मौलिक स्वरचित रचना

@ अजय कुमार झा.

मुरादपुर, सहरसा, बिहार.

18/8/2021.


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