ग़ज़ल
आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया,
जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया
जमीर बेच दिया उसने थोड़ी सी दौलत की खातिर,
यह क्या हो रहा आज ज़माने में अख़बार बोलता
इक ईमानदार अफसर परेशान है घर चलाने में
सियासत की गणित मानवता ख़त्म कर रही अब,
ग़ज़ल आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया, जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया …
आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया,
जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया
April 25, 2022
कविता-विज्ञान में हम को आधुनिक बनाया यह विज्ञान है जिसने हमको आधुनिक बनाया आसान हुआ हर काम हमको इस लायक
April 25, 2022
कविता -मां का वात्सल्य प्रेमामई ममता मां वात्सल्य प्रेमामई ममता मिलती हैं सभको कोई अच्छूता नहीं कद्र करने की बात
April 25, 2022
कविताहां फ़िर भी मुझ पर शक करो मैंने किसी की बुराई, चुगली, चोरी की नहींहां फिर भी मुझ पर शक
April 25, 2022
कविता-बावीस भाषाओं में नवाचार कार्यक्रम नीति आयोग ने देश में नवोन्मेष उद्यमियों को बढ़ावा देने के स्थानीय भाषाओं में नवाचार
April 25, 2022
महाबली हनुमंत जय जय श्री हनुमंत वीरमां अंजनी के हो तुम जायेअति पराक्रमी बचपन थे तुम्हारेबना दिया सूर्य को खिलौनाराम
April 20, 2022
खास ! जब तक तुझ में सांस है, सफलता की आस है,खुशनुमा सा एहसास है,पूरा जोश और साहस है,मानो तो