ग़ज़ल
आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया,
जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया
जमीर बेच दिया उसने थोड़ी सी दौलत की खातिर,
यह क्या हो रहा आज ज़माने में अख़बार बोलता
इक ईमानदार अफसर परेशान है घर चलाने में
सियासत की गणित मानवता ख़त्म कर रही अब,
ग़ज़ल आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया, जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया …
आजकल शहर में एक फ़साना सरे आम हो गया,
जब से यार मेरा सियासी लोगो का गुलाम हो गया
November 7, 2021
बेटा – बेटी एक समान आदर्शवाद दिखाने के लिए हमनें पाठ्य – पुस्तकों में अपनी लिखा दिया, “बेटा – बेटी
November 7, 2021
चुनौती से कम नहीं वक्त बीतता जाता है जैसे-जैसे कुंद पड़ती जाती है दांपत्य में धार नयेपन की, जिन नजरों
November 7, 2021
झूठा भ्रम रोक नहीं पाते जब तुम दुनिया के सब मजलूमों पर होने वाले ज़ुल्म-ओ-सितम तो फिर तुम्हारे ‘दुखहर्ता’ होने
November 7, 2021
एक व्यंग्य नशा सबका मनोरंजन करते अभिनेता पर अपने घर में समय न देते। धन तो खूब कमा लेते पर
November 7, 2021
प्यार भरा गीत एक प्यार का गीत सुना दो, बंसी की मधुर तान सुना दो। मोहन गोपियों संग राधा अकु
November 7, 2021
रौनक लौट आई लम्बे अरसे के बाद सही पर……रौनक लौट रही। सज रहे बाजार बहुत समय के बाद । घरों