Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Ek stree ki vyatha by Jitendra Kabir

 एक स्त्री की व्यथा पहली नजर में… बड़ा सभ्य और सुसंस्कृत नजर आया था वो इंसान, गाली-गलौज पर उतरा वो  …


 एक स्त्री की व्यथा

Ek stree ki vyatha by Jitendra Kabir

पहली नजर में…

बड़ा सभ्य और सुसंस्कृत नजर आया था

वो इंसान,

गाली-गलौज पर उतरा वो 

शादी के कुछ समय बाद

जब ले नहीं सकती थी आसानी से मैं

सामाजिक लांछन का भार,

वो जानता है

कि चारा नहीं है कोई मेरे पास

सिवाय आंसू बहाकर बैठने 

के अलावा चुपचाप

इसलिए छोड़ता नहीं वो अब कोई मौका

वक्त-बेवक्त मुझे जलील करने का,

भरोसा तोड़कर उसने मेरा

सूली पर मुझे टांग दिया है

मैंने भी उसको समर्पित मेरा हिस्सा

मरा हुआ सा मान लिया है।

पहले एक – दो साल…

बड़ा संवेदनशील व ख्याल रखने वाला

लगा था वो इंसान,

जिद्दी, क्रोधी और सनकी स्वभाव

दिखाया उसने उसके बाद,

सिर्फ शारीरिक जरूरत पूरी करने का

साधन भर बनकर रह गई मैं

इंसान भी हूं जीती-जागती

रहा न फिर उसको याद,

वो जानता है 

उम्र के इस पड़ाव पर आकर

सामाजिक प्रतिष्ठा का है मुझपर 

बड़ा दवाब

इसलिए जमकर करता है वो मनमानी

तोड़कर रोज 

सुकून तलाशते मेरे ख्वाब,

अस्तित्व मिटाकर उसने मेरा

सूली पर मुझे टांग दिया है

मैंने भी उसको समर्पित मेरा हिस्सा

मरा हुआ सा मान लिया है।

                           जितेन्द्र ‘कबीर’

                           

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

चिंतन के क्षण- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

December 22, 2021

चिंतन के क्षण रोम रोम में बसी है यादें,बचा नहीं कुछ अपना है,तेरे मेरे अपने सारे सपने,बिखर गए सारे के

बेरोजगारी का एक पहलू यह भी- जितेन्द्र ‘कबीर’

December 22, 2021

बेरोजगारी का एक पहलू यह भी आजकल लोगों कोघर का काम करने के लिएईमानदार और मेहनती लोग नहीं मिलते,जमीन का

रूठे यार को मनाऊं कैसे-अंकुर सिंह

December 21, 2021

रूठे यार को मनाऊं कैसे रूठे को मैं कैसे मनाऊं, होती जिनसे बात नहीं,यादों में मैं उनके तड़पूउनको मेरा ख्याल

संवेदना- डॉ इंदु कुमारी

December 21, 2021

संवेदना मानव हम कहलाते हैं क्या हमने अंतस् मेंकभी झांककर देखा हैस्वार्थ में सदा जीते रहेपर पीड़ा कभी देखा हैअगर

सफर-डॉ. माध्वी बोरसे!

December 20, 2021

सफर! बहुत समय से बैठे हैं, घर के अंदर, चलो करें, शुरू एक नया सफर,घूमे गांव और अलग-अलग शहर,महसूस करें,

कविता अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस 2021-किशन सनमुखदास

December 20, 2021

कविताअंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस 2021 अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस सबने मिलकर दिव्यांगजन को उत्साह देखकर मनाए हैं राष्ट्रपति प्रधानमंत्री ने अपने संदेश

Leave a Comment