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Corona Kal ek dard kavita by vijay Lakshmi Pandey

 कोरोना काल …एक दर्द ..!!! दिन   सहम   गया । दिन   सहम   गया ।। वह  दबे पाँव भीतर जाकर , सांकल  …


 कोरोना काल …एक दर्द ..!!!

Corona Kal ek dard kavita by vijay Lakshmi Pandey

दिन   सहम   गया ।

दिन   सहम   गया ।।

वह  दबे पाँव भीतर जाकर ,

सांकल   देकर  दुबक गया ।

दिन  सहम  गया ,

दिन  सहम  गया ।।

हमनें  बचपन  को कैसा देखा ?

सुबह -शाम  हंसता   देखा  ।

अबके  बचपन  की देख कहानी ,

मुँह  बंधा😷पाँव ठिठका  देखा ।।

घर के कोनें में  ठहर 🤒  गया  ।

दिन  सहम  गया ,

दिन   सहम  गया ।।

बच्चों  का बचपन  ले डूबा ,

बूढ़ों  की  महफ़िल ले  डूबा।

लूट  गई तरुण की रंगत तो ,

हैरान  हुई है  संगत तो ।

पंगत  की रंगत,   बदल गया ।

दिन   सहम  गया 

दिन सहम   गया ।।

कितनीं  बार तलैया सूखी ,

कितनीं  बार  गगरिया फूटी ।

कितनें  सूखे कुएं  बावड़ी ,

अबके  क्यों  दिन सहम  गया..??

दिन  सहम  गया ।

दिन  सहम गया ।।

उनके बिन  दिन सहम गया ,

जिनके  परिजन छोड़ चले ।

उनके  बिन दिन सहम गया ,

जिनके अपनें अनजान हुए ।।

भूले -बिसरे  अपनों के बिन ,

दिन सहम  गया ,

दिन  सहम  गया।।

        विजय लक्ष्मी पांडेय 

        एम. ए. बी.एड.(हिन्दी)

         स्वरचित  मौलिक रचना

         विधा   संस्मरण


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