Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Budhati aakho ki aash by jitendra kabir

 बुढ़ाती आंखों की आस लाखों – करोड़ों रुपयों की लागत में बनी आलीशान कोठी में, बीतते समय के साथ बुढ़ाती …


 बुढ़ाती आंखों की आस

Budhati aakho ki aash by jitendra kabir

लाखों – करोड़ों रुपयों की

लागत में बनी

आलीशान कोठी में,

बीतते समय के साथ बुढ़ाती

धुंधलाती हुई सी 

दो जोड़ी आंखें,

राह देखती हैं वर्ष भर

दो जोड़ी वयस्क और दो जोड़ी

नन्हें पांवों की,

वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिनों के

आठ हजार सात सौ पैंसठ घण्टों के

पांच लाख पच्चीस हजार छ: सौ मिनटों के

तीन करोड़ पंद्रह लाख छत्तीस हजार सेकंड का

बेहद लम्बा व सूनेपन से भरा उनका इंतजार,

उन पांच – दस दिनों के लिए 

खूब बरसता है

अपनी भावी पीढ़ियों के ऊपर 

बनकर प्यार और दुलार।

बाकी का पूरा समय 

वो दो जोड़ी आंखें

अपने बेटे को पढ़ाने-लिखाने में की गई

मेहनत को करती हैं बड़ी शिद्दत से याद,

उसके द्वारा हासिल की गई सफलता को

मानती हैं अपनी मेहनत का प्रसाद,

लेकिन फिर भी यह शानदार कोठी,

रुपया-पैसा, सामाजिक रुतबा रोक नहीं पाता

उम्र के इस मोड़ पर 

उन दोनों को होने से लाचार और उदास,

हताशा में कई बार सोचते हैं वो

कितना अच्छा होता कि बेटा उनका

उनके पास ही रहकर करता

कोई छोटा-मोटा कारोबार

तो कम से कम उनके लिए थोड़ा

वक्त होता उसके पास और 

अपने पोते-पोती के साथ समय बिताकर

उन दोनों में भी

जिंदा रहती जिंदगी जीने की आस।

                                            जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

मैं मणिपुर हूं | main Manipur hun kavita

August 11, 2023

मैं मणिपुर हूं सुन सको तो सुनो, दिल को मजबूत कर, दास्तां अपने ग़म की बताता हूं मैं,मैं मणिपुर हूं,

मैं, मैं होकर भी, मैं ना रह गई

August 11, 2023

मैं, मैं होकर भी, मैं ना रह गई दर्द-ए चीख मेरी, मेरे ही भीतर तोड़ मुझे घुटके रह गईनकाब हंसी

Munshi premchandra par kavita |प्रेमचंद

July 31, 2023

प्रेमचंद Munshi premchandra एक ख़्वाहिश है, कि कभी जो तुम एक दोस्त बनकर मिलो,तो कुल्हड़ में चाय लेकर,तुम्हारे साथ सुबह

सात सुरों से भर दो | saat suron se bhar do kavita

July 28, 2023

सात सुरों से भर दो सात सुरों से भर दो बेरंग सी हुई मेरी दर्द-ए जिंदगी में, रंग भर दो

नव वसंत | Nav basant by priti Chaudhary

July 24, 2023

नव वसंत नव वसंत तुम लेकर आना, पतझर सा है यह जीवन। सूख चुकी है सब शाखाएँ, झरते नित ही

कविता -जीभ|ज़बान | kavita :jeebh | jaban

July 21, 2023

कविता -जीभ|ज़बान | kavita:jeebh | jaban आवाज़ की तेरे मैं साथी,स्वाद से कराती तेरी पहचान।चाहे हो भोजन या फिर रिश्ते,मेरा

PreviousNext

Leave a Comment