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Bhookh by Anita Sharma

 भूख भूख की आग से तड़पता है कि भिखारी हाथ फैलाए भीख मांगता। कहीं कचड़े में कोई जीर्ण शीर्ण सा …


 भूख

Bhookh by Anita Sharma

भूख की आग से तड़पता है कि

भिखारी हाथ फैलाए भीख मांगता।

कहीं कचड़े में कोई जीर्ण शीर्ण सा

रोटी उठाकर खा रहा।

**

कहीं सत्ता की भूख बढ़ रही

निरंकुशता की लौ धधक रही ।

बढ़ रहे हैं पेट और जेब भी

भूख के नये रूप रंग भी ।

**

लालच भी मुँह बा रही

घूसखोरी चरम पर बढ़ रही।

कालाबाजारी करने वाले भी

 क्षुधापूरति खुलेआम कर रहे।

**

वहीं कहीं पर ज्ञानी जन भी ।

ज्ञानवर्धक लेख लिख-पढ़ रहे।

ज्ञान की पिपासा ले डूबते किताबों में।

पिपासु चक्षु ज्ञानवर्धन साहित्य ढूंढते।

**

एकान्त शून्य शान्ति में साधुजन

आध्यात्म ध्यान रत दिखे।

संसार से दूर-दूर वे आराध्य को खोजते।

**

है भूख पेट की कहीं तो

कहीं सत्ता की भूख दिख रही।

ज्ञान की पिपासा की भूख बढ़ रही।

वही साधुओं में आध्यात्म की भूख जाग्रत हो रही।

**

भूख की आग से तड़पता  

भिन्न-भिन्न प्राणी है।

चेतना है भिन्न सी,मनःस्थिति भिन्न सी।

**

—–अनिता शर्मा झाँसी

—–मौलिक रचना


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