Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Beta beti ek saman by Jitendra Kabir

 बेटा – बेटी एक समान आदर्शवाद दिखाने के लिए  हमनें पाठ्य – पुस्तकों में अपनी  लिखा दिया, “बेटा – बेटी …


 बेटा – बेटी एक समान

Beta beti ek saman by Jitendra Kabir

आदर्शवाद दिखाने के लिए 

हमनें पाठ्य – पुस्तकों में अपनी 

लिखा दिया,

“बेटा – बेटी एक समान”

फिर समाज के अधिकांश लोगों ने

उनके जन्म की खुशियां मनाने से लेकर

पालने – पोसने, शिक्षा – दीक्षा,

नौकरी – चाकरी, शादी – विवाह,

यहां तक कि दोस्तों के साथ 

बाहर निकलने, मिलने जुलने के

मानदण्ड नहीं रखें समान,

बेटियों को पराया धन मानकर

देते रहे नैतिकता व शालीनता की नसीहतें,

वैधव्य के लिए माना जाता रहा उन्हें मनहूस

और परित्यकता हुई तो चरित्र दागदार,

लेकिन इसके उलट बेटों के आवारापन को भी

समझते रहे बहुत से लोग अपनी शान,

बेटियों का अपने पिता की सम्पत्ति से

हिस्सा लेना रखा सामाजिक निंदा के दायरे में

ताकि व्यवहारिक तौर पर मालिक रहे

जमीन व सम्पत्ति का बेटा ही

लेकिन अपनी निष्पक्षता दिखाने के लिए

कर दिया बराबर हिस्से का कानूनी प्रावधान,

अपने प्रगतिशीलता,शिक्षा एवं आधुनिकता के

तमाम दावों के बावजूद हमारा समाज

रूढ़ियों में जकड़े रहने को देता है अधिमान,

आश्चर्य नहीं होगा इसमें कोई कि बनी रहे

आने वाले सैंकड़ों सालों तक भी हमारी

लैंगिक भेदभाव पूर्ण समाज के रूप में 

वैश्विक पहचान।

                              

       जितेन्द्र ‘कबीर’
साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’
संप्रति- अध्यापक
पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश
संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

जीवन है तो जिए जाना- जितेन्द्र ‘कबीर’

January 13, 2022

जीवन है तो जिए जाना बहुत तकलीफ़ देता है अपने किसी करीबी काइस दुनिया से असमय चले जाना, किसी हंसते

मान हैं मुझे तुम पर-जयश्री बिरमी

January 13, 2022

मान हैं मुझे तुम पर आन भी हैं तू मान भी हैं तूहिंदी तू हिंदुस्तान की जान हैं तूतेरी मीठे

उनके संज्ञान में क्यों नहीं है?-जितेन्द्र ‘कबीर’

January 13, 2022

उनके संज्ञान में क्यों नहीं है? हर बार सामने आती हैंजांच एजेंसियों कीदेरी और लापरवाही की खबरेंबलात्कार,हत्या जैसे संगीन मामलों

परछाईं- सुधीर श्रीवास्तव

January 13, 2022

परछाईं वक्त कितना भी बदल जायेहम कितने भी आधुनिक हो जायें, कितने भी गरीब या अमीर होंराजा या रंक हों

आज की द्रौपदी- जयश्री बिरमी

January 13, 2022

आज की द्रौपदी एक तो द्रौपदी थी तबअनेक है आज भीक्यों बचा न पाए आज के कृष्णजब बिलखती हैं वहआज

हिन्दी बेचारी- डॉ. इन्दु कुमारी

January 13, 2022

हिन्दी बेचारी राष्ट्र है मेरे अपने घरभारती हूँ मैं कहलाती जनमानस की हूँ सदासरल अभिव्यक्ति मैं राजदुलारी जन सभा कीअवहेलना

Leave a Comment