Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Azadi kish liye chahi thi humne by Jitendra Kabeer

 आजादी किस लिए चाही थी हमनें हम भारतीयों के साथ भेदभाव करते थे अंग्रेज खुद को कुलीन मानकर, नीचा दिखाते …


 आजादी किस लिए चाही थी हमनें

Azadi kish liye chahi thi humne by Jitendra Kabeer

हम भारतीयों के साथ भेदभाव करते थे अंग्रेज

खुद को कुलीन मानकर,

नीचा दिखाते थे हमें वो असभ्य जानकर,

आजादी के इतने सालों बाद हम आज भी

भेदभाव करते हैं एक-दूसरे से

जाति-धर्म, प्रांत, भाषा, अशिक्षा और

गरीबी के नाम पर,

जब गुलाम ही बने रहना था हमें

ऐसी तुच्छ मानसिकताओं के

तो बताओ जरा, आजादी चाही थी हमनें

खुद पर रहे कौन से गुमान पर।

हम भारतीयों का शोषण किया करते थे अंग्रेज

खुद को हमारा मालिक मानकर,

हर तरह से शोषण को अपना हक जानकर,

आजादी के इतने सालों बाद हम आज भी

शोषित होते हैं झूठे चुनावी वादों,

चौतरफा भ्रष्टाचार, गुण्डागर्दी और 

महंगाई के नाम पर,

जब शोषण जारी रहना ही था जनता का

किसी न किसी तरीके से

तो बताओ जरा, आजादी चाही थी हमनें

खुद पर रहे कौन से गुमान पर।

अंग्रेजी राज का विरोध करने वाले

हम भारतीयों को राजद्रोही कहा करते थे अंग्रेज

खुद को हमारा राजा मानकर,

प्रताड़ित करते थे हम सबको दुश्मन जानकर,

आजादी के इतने सालों बाद हम आज भी

राजद्रोही ठहराए जाते हैं

उतरते हैं जब भी सड़कों पर अपने खिलाफ हुए

अत्याचार के नाम पर,

जब ऐसा ही नजरिया रहना था जनता के प्रति

इस देश की सरकारों का

तो बताओ जरा, आजादी चाही थी हमनें

खुद पर रहे कौन से गुमान पर।

                                            जितेन्द्र ‘कबीर’

                                            

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति- अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

Udi re patang by Anita Sharma

November 9, 2021

 उड़ी रे पतंग* उड़ी उड़ी रे पतंग मेरी उड़ी रे। लेके भावनाओं के साथ उड़ी रे। भर के उमंगो संग

Kaun tay karke aaya tha? by Jitendra Kabir

November 7, 2021

 कौन तय करके आया था? ब्राह्मण के घर लेना था जन्म या फिर क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के यहां, कौन

sushasan ko akhiri chhor tak le jana hai by kisan bhavnani

November 7, 2021

 कवितासुशासन को आखिरी छोर तक ले जाना हैं  सरकारों को ऐसी नीतियां बनाना हैं  सुशासन को आखरी छोर तक ले

Ab ki baar aise ho diwali by Mainudeen Kohri

November 7, 2021

 अब की बार ऐसी हो दिवाली अबकी बार मनाओ ऐसी दिवाली  । गाँव – शहर में हो जाए खुशहाली ।

parkota by mainudeen kohri

November 7, 2021

 परकोटा मैं परकोटा हूँ न जाने कब से खड़ा हूँ मेरा इतिहास बड़ा है मैं कई युद्धों व् योद्धाओं का

यादें – जयश्री बिरमी

November 7, 2021

 यादें दिवाली तो वो भी थी जब ऑनलाइन शुभेच्छाएं दी थी हमने और एक ये भी हैं जब रूबरू हैं

Leave a Comment