Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Andhnishtha me andhe inshan by Jitendra kabir

 अंधनिष्ठा में अंधे इंसान धर्म का चश्मा अपनी अक्ल पर पहने इंसान दूसरे धर्मों में देखता है केवल कमियां, उनकी …


 अंधनिष्ठा में अंधे इंसान

Andhnishtha me andhe inshan by Jitendra kabir

धर्म का चश्मा अपनी अक्ल पर

पहने इंसान

दूसरे धर्मों में देखता है केवल कमियां,

उनकी खूबियों की

आलोचना करने के लिए भी 

सोचे रहता है वो मन में तर्क कई,

जबकि अपने धर्म की

देखता है वो सिर्फ खूबियां,

कमियों पर उसकी वो

विश्वास कभी करता नहीं,

इसी चश्में के प्रभाव में

ठहराता जाता है वो धर्म के नाम पर

नरसंहारों को भी सार्वजनिक तौर पर सही।

इसी तरह आजकल 

किसी दल विशेष का समर्थक इंसान

दूसरे दलों में निकालता है केवल कमियां,

उनकी खूबियों को

अपनी सच्ची – झूठी दलीलों से

हमेशा करता है दरकिनार,

जबकि अपने दल के बारे में आलोचना

वो कभी किसी से सुनना चाहता नहीं,

इसी अंधनिष्ठा के प्रभाव से

ठहराता जाता है वो अपने दल के

झूठे प्रचार एवं गलत निर्णयों को भी

सार्वजनिक तौर पर सही।

                                   जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश


Related Posts

सुख–दुख पर कविता

December 15, 2022

कविता–जिंदगी सुखों और दुखों का ख़ूबसूरत मेल है जिंदगी में उतार-चढ़ाव बस एक ख़ूबसूरत खेल है जिंदगी सुखों और दुखों

विश्वास जो टूटे | vishwas jo toote

December 14, 2022

विश्वास जो टूटे | vishwas jo toote जब कभी रिशतों के दरमियान विश्वास टूट जाता हैवो रिश्ता , रिश्ता नहीं

अंतर्मन को संवारते जा। Antarman ko sanwarte ja

December 14, 2022

अंतर्मन को संवारते जा। जाने वाले को बार-बार रोका नहीं करते,अकेले जीने से डरा नहीं करते,टूट गया जो बर्तन टूटना

मेला तोना , मेला बाबू | kavita- mela tona, mela babu

December 12, 2022

मेला तोना , मेला बाबू देखो-देखो ये क्या हो रहा हैमेला तोना , मेला बाबू तलन(चलन)में युवा खो रहा है।।मेला

व्यंग्य कविता -मासिक शासकीय पगार चौदह हज़ार है

December 12, 2022

 यह व्यंग्यात्मक कविता भ्रष्टाचार की हदें पार है?क्योंकि मेरा वेतन केवल चौदह हज़ार है।पर एक महीनें में मेरा खर्चा लाखों

शासकीय ठप्पे वाली वस्तुओं की हेराफेरी करता हूं | shaskeeye thappe wali vastuon ki heraferi karta hun

December 11, 2022

यह कविता अनाज सीमेंट इत्यादि शासकीय अलॉटमेंट वाली वस्तुओंं पर केंद्र या राज्य सरकार के ठप्पे लगे रहते हैं ।परंतु

PreviousNext

Leave a Comment