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Anant path by madhushri maharashtra

अनंत पथ ओ पथिक अनंत पथ केछोड़ उठ चल कुछ न अपनाजो भी था तेरा नहीउद्भ्रांत जग का था सपनाअब …


अनंत पथ

Anant path by madhushri maharashtra

ओ पथिक अनंत पथ के
छोड़ उठ चल कुछ न अपना
जो भी था तेरा नही
उद्भ्रांत जग का था सपना
अब न तेरा ठाँव कोई
ना ही कोई गांव है ।
आभासी चंद्रिका थी झूठी
नेह तारों से भी टूटी
ताल के तट पुतिन छूटे
हिय धरा अनुबंध टूटे
तपते सूरज की चदरिया
अब तो ठंडी छांव है ।
निशि गुज़रती है कहीं
वासर का ठिकाना नहीं
सुख का सूरज डूबता तो
दुख का बहाना नहीं
भेद से अभेद तक
गतिशून्य होती चाह है ।
क्षितिज की नव कल्पना में
खुल रहा अमरत्व पथ
दृष्टि धुँधली खोजती
नवभोर को अबरान्त तक
घन तिमिर में चमकती नित
सत्य की निज राह है।

मधु श्री
मुम्बई महाराष्ट्र

@सर्वाधिकार सुरक्षित


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