Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

Abhi ummeed bemani hai by Jitendra Kabir

 अभी उम्मीद बेमानी है अभी तक धर्म है… उस पर मंडराते बहुत से सच्चे – झूठे खतरे हैं, हमारे नेताओं …


 अभी उम्मीद बेमानी है

Abhi ummeed bemani hai by Jitendra Kabir

अभी तक धर्म है…

उस पर मंडराते बहुत से

सच्चे – झूठे खतरे हैं,

हमारे नेताओं के पास

वोट लेने का हथियार,

जनता के हित में 

फैसलों की उनसे उम्मीद

अभी तक बेमानी है

और जिस तरह से नेताओं द्वारा

प्रचारित किया जा रहा है  

धर्म को मानव हित  से कहीं ऊपर

लगता है कि अभी तक

आने वाले बहुत वर्षों तक इस देश में

दोहराई जाने वाली यही कहानी है।

अभी तक जातिवाद है…

दलित – सवर्ण के बीच

सामाजिक न्याय का 

सदियों पुराना आपसी तनाव है,

हमारे नेताओं के पास

वोट लेने का हथियार,

लोक कल्याणकारी शासन की

उनसे उम्मीद करना

अभी तक बेमानी है

और जिस तरह से नेताओं द्वारा

जातिगत समीकरणों को

उभारा जाता है हर चुनाव में

लगता है कि अभी तक

आने वाले बहुत वर्षों तक इस देश में

दोहराई जाने वाली यही कहानी है।

                              जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति – अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

सुंदर सुरों की नदियाँ / sundar suron ki nadiyan

July 15, 2022

 “सुंदर सुरों की नदियाँ जानें किस ओर मूड़ गई”  कभी मेरे देश में बहती बयार से खुशबू आती थी अमन

गले लगाना चाहती/ gale lagana chahti

July 14, 2022

 गले लगाना चाहती गले लगाना चाहती हूँ तुझे अबना चाहिए अब और कुछ, बस तुझमें समा जाना चाहती हूँएक कदम

ना लीजिए उधार!/na lijiye udhar

July 13, 2022

ना लीजिए उधार! ना लीजिए उधार, बन जाओ खुद्दार, लाए अपनी दिनचर्या में, थोड़ा सा सुधार, अपने कार्य के प्रति,

सच जिंदगी बोलती हैं. |Sach zindagi bolti hai

July 4, 2022

 सच जिंदगी बोलती हैं…..  Sach zindagi bolti hai  ध्यान से सुनो जिंदगी बोलती हैं   कभी हँसती कभी रोती हैं नई

गलतफहमी

June 29, 2022

 गलतफहमी! Dr. Madhvi borse  गलतफहमी में ना जी इंसान, जीवन कभी भी हो जाएगा वीरान, खुदगर्जी में दूसरों को तकलीफ

वृद्धाश्रम की वेदना

June 27, 2022

 “वृद्धाश्रम की वेदना” सिसकती है कई ज़िंदगीयां उस दोज़ख के भीतर एक गुमनाम सी उम्र ढ़ोते, सुलगती है ममता और

PreviousNext

Leave a Comment