Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

laghukatha, story

100 का नोट

100 का नोट बिहारीबाबू सरकारी दफ्तर में बाबू थे इसलिए सब उन्हे सरकारी बाबू के नाम से ही जानते थे।इस …


100 का नोट

100 ka note kahani by jayshree birmi

बिहारीबाबू सरकारी दफ्तर में बाबू थे इसलिए सब उन्हे सरकारी बाबू के नाम से ही जानते थे।इस बार तनख्वाह में मैं भी मेरे दूसरे ८ भाइयों के साथ उनकी जेब में आया था।राशन,किराया आदि में मेरे दो भाई तो चले गए थे ,अब हम सात ही रह गए थे।जी मैं १०० का नॉट हूं।
सरकारी बाबू का बेटा काफी अच्छे नंबरों से १० वी की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ था और घर में सब खुश भी बहुत थे।आस पड़ोस वालों ने मुंह मीठा करने की फरमाइश शुरू करदी थी।श्रीमती जी ने भी हलवाई से लड्डू मंगवा कर सब के घर पहुंचा दिया था और सब बधाई दे रहे थे।
उत्तीर्ण तो हो गया लेकिन दूसरी पाठशाला में उच्च माध्यमिक ने दाखिला लेना बाकी था।
सभी दस्तावेजी कागजों की नकलें निकलवा एक साथ तीन चार विद्यालयों में अर्जी देंने निकले थे।उनका बेटा भी खुश था कि अच्छे विद्यालय में दाखिला मिल जाएगा, उसी उम्मीद में वे वापस आए।उन्हों ने दो तीन दिन बाद पता करने के लिए बोला था।और जब हम दोनों पहुंचे तो बाहर सूची में बेटे का नाम नहीं देख उन्हेे आश्चर्य हुआ,अच्छे नंबर होने बावजूद नाम क्यों नदारद था, ये भी बड़ा प्रश्न दिख रहा था उनके बेटे की नजरों में।वह हड़बड़ाहट में दफ्तर की ओर भागा और क्लार्क महाशय को पूछा कि क्या बात थी कि सूची में उनके बेटे का नाम नहीं था।उसने पहले तो अनजान बनते हुए अपना काम चालू रखा और उनके सवाल को अनसुना कर दिया। उन्होंंने जोर से बोला तब अपनी फाइलों में से ऊंचे देख बोला कि नाम तो होना चाहिए था पता नहीं क्या हुआ।फिर फाइलों में खो सा गया।वेे लोग बाहर जा वापस से सूची देखने लगे लेकिन नहीं मिला उनके बेटे का नाम।वे फिर दफ्तर में गये और क्लर्क साब से बात की और बिनती भी की,कुछ हो सकता था क्या,उनके बेटे को बहुत आशा थी कि उसे इसी विद्यालय में दाखिला मिल जाए। और येे भी सोचा कि एक ९०० रुपिए तनख्वाह वाले सरकारी बाबू के बच्चे को इतने अच्छे विद्यालय में पढ़ना एक गर्व की बात थी।और थोड़ी देर बाद बाहर इंतजार करते बैठे रहें,आंखों में आशा लिए।थोड़ी देर में क्लर्क साब ने किसी को भेजा और उनको कौने में ले गया और कुछ फुसफुसाया जो मैं उनकी जेब में होंने के बावजूद नहीं सुन पाया।कुछ देर बाद वे क्लर्क साब के पास गए और बड़ी ही बेेदिली के साथ मुझे जेब से निकाल चुपके से उनकी हथेली में दबा बाहर निकल गए और मैं कुछ समझूं उससे पहले क्लर्क बाबू ने तेजी से मुझे अपनी जेब में रख दिया।
शाम ६ बजे तक क्लर्क बाबू की जेब में रहा और फिर क्लर्क बाबू दफ्तर छोड़ चल पड़े ।उनके पास तो स्कूटर था,वैसे तनख्वाह कुछ ज्यादा नहीं होगी किंतु कमाई ज्यादा लग रही थी वरना तीन हजार का स्कूटर कैसे ले पाते।मुझे भी स्कूटर की सवारी में मजा आ रहा था ,जेब में था फिर भी हवा की फरफराहट महसूस कर रहा था।और एक जटके में स्कूटर रुका और सामने देखा तो पुलिस महाशय डंडा पकड़े खड़े थे और क्लर्क बाबू को नो एंट्री का बोर्ड दिखा नो एंट्री का जुर्माना मांग रहे थे।टिकिट ले कोर्ट में हाजिर होने की कह रहे थे।क्लर्क बाबू ने सोचा होगा कौन जायेगा कोर्ट और दिन बिगड़ेगा कुछ ले दे के निबटा देने की बात की तो पुलिस वाले की आंखे चमक गई।क्लर्क बाबू ने ५० का इशारा किया किंतु पुलिस वाले ने ठेंगा हिला छुट्टा नहीं होने का इशारा किया और बगैर मर्जी के क्लर्क बाबू ने मुझे उनके हाथ में थमा चल दिए।
क्लर्क सब की जेब में तो मैं अकेली ही थी किंतु पुलिस की जेब में मेरे जैसे कई नॉट थी मैं भी उनके साथ बस गई।घर जा श्रीमती जी को हम सब को थमा वर्दी निकाल गुसलखाने में चले गए पुलिस जी।हम श्रीमती के कोमल हाथों से अलमारी में चले गएं और अलमारी बंद हो गई।पता नही कितने दिन बंद रहे किंतु एकदिन श्रीमती जी हमे बाटुएं में डाल बाहर निकल गई और थोड़ी देर मैं मंदिर पहुंची और प्रवचन सुनने बैठ गई।बाबा पता नहीं क्या क्या बाते बताते गए किंतु मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था।और जैसे ही प्रवचन पूरा हुआ स्वामीजी के चरणों में मुझे डाल खुद भी जूक गई और वहां से उठ चलदी।अब हम बाबाजी के कमंडल में बहुत सारे छोटे बड़े नोटों के साथ सुबह तक पड़े रहे और सुबह बाबाजी का कोई चेला आया और हमे समेट एक बस्ते में डाल दिया।थोड़े दिन बाद ऐसे पड़े रहे और एकदिन बाबाजी को मिलने कोई नेताजी आएं शायद बाबाजी की आमदनी में उनका भी हिस्सा था वह लेने, दोनों कुछ पी रहे थे ग्लास में डाल कर और बतियां रहे था काफी देर तक,नेताजी ने अपने दल को उनके प्रवचन द्वारा प्रसिद्धि दिलवाने का आग्रह कर अपना हिस्सा यानि कि मुझे ले चले गए।और फिर मेरी यात्रा शुरू हो गई।नेताजी के घर गए और सीधे अलमारी में बंद कर दिए गए।
फिर समय कितना बीता पता नहीं चला लेकिन एक दिन नेताजी ने हम में से कुछ नॉट निकालें और किसी को फोन कर बुलाया और अपना हिस्सा लेने की बात की और फोन रख दिया।थोड़ी देर बाद एक महाशय आए और बैठे नेताजी ने उन के हाथों में हम सब को रख बोले,” तुमने हमें जिताने के लिए बहुत मेहनत की हैं , अब हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता हैं।ये लो तुम्हारा हिस्सा।” और उनके हाथ में हम सभी को रख दिए ,ओह ये क्या ये तो जाने पहचाने हाथ हैं,और उनके स्पर्श को पहचान ही लिया मैंने,सरकारी बाबू थे ,उनकी तरफ से दी गई रिश्वत, रिश्वत ही बन मैं वापस उन्ही के पास आ गई थी।

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


Related Posts

कहानी प्यार की

April 27, 2022

कहानी प्यार की सीमा और विमल के प्यार के चर्चे उनके पूरे ग्रुप में खूब थे।दो दिल एक जान थे

कहानी -वारसदार की महिमा

April 25, 2022

 “वारसदार की महिमा” आज ‘सनशाइन विला’ को स्वर्ग सा सजाया गया है, मेहमानों को दावत दी गई है, सबकुछ होते

कहानी – गुरु दक्षिणा

April 25, 2022

कहानी- “गुरु दक्षिणा” वृंदा ने अपने पति संजय से कहा सुनिए दिवाली आ रही है, अडोस-पड़ोस के सारे बच्चें नये

पंचलाइट(पंचलैट): फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी| Panchlight story

April 16, 2022

Panchlight : Hindi story by phanishwarnath Renu पंचलाइट(पंचलैट): फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी  पिछले पन्द्रह दिनों से दंड-जुरमाने के पैसे जमा करके

कहानी -खत्री बहन जी

March 26, 2022

खत्री बहन जी (hindi stories) इसी नाम से मुहल्ले के बच्चे व बड़े उसे जानते थे । मुहल्ले के पश्चिमी

लघु कथा-अंधेरी गुफा का बूढा शेर

March 26, 2022

लघु कथा: अंधेरी गुफा का बूढा शेर जंगल का राजा बूढा शेर अंधेरी गुफा मे बैठा रहता था।उसके साथ एक

PreviousNext

Leave a Comment