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“हेट्स ऑफ़ पुष्पा” (स्त्री सशक्तिकरण का बेनमून उदाहरण)

 “हेट्स ऑफ़ पुष्पा” (स्त्री सशक्तिकरण का बेनमून उदाहरण) भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर हम टीवी सिर्फ़ मनोरंजन के लिए देखते है …


 “हेट्स ऑफ़ पुष्पा” (स्त्री सशक्तिकरण का बेनमून उदाहरण)

भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर
भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर

हम टीवी सिर्फ़ मनोरंजन के लिए देखते है पर कभी कभी कोई सीरियल या पात्र हमारा पसंदीदा बन जाता है। वैसे तो आज तक कभी किसी सीरियल ने दिल को इतना भावनात्मक रूप से नहीं छुआ जितना पुष्पा इंपासिबल ने। 

आजकल टीवी पर सोनी सब चैनल पर पुष्पा इंपासिबल नाम से सीरियल चल रही है, उसमें जो पुष्पा का मुख्य पात्र दर्शाया गया है वो स्त्री सशक्तिकरण का एक बेनमून उदाहरण है। करुणा पांडे ने इस पात्र के साथ पूरा न्याय किया है। कैसे एक अकेली स्त्री तीन बच्चों को अकेले हाथों हर परिस्थिति का बखूबी सामना करते, पाल-पोषकर बड़ा करती है उस सिच्यूएशन को बहुत सुंदर तरीके से पेश किया है। गजब का आत्मविश्वास है उस स्त्री का। जो उपमाएं दी जाती है नारियों को उमा, दुर्गा और लक्ष्मी की शायद ऐसी स्त्रियाँ उसे परिभाषित करती है।

पुष्पा का पति सालों पहले तीन बच्चों के साथ पुष्पा को अकेला छोड़ कर कहीं भाग गया है, जिसे सब भगोडा कहते है। पुष्पा जब भी ज़िंदगी की चुनौतियों से त्रस्त होती है तब पति की तस्वीर के सामने अपनी भड़ास निकालते कोस लेती है। पर एक चुनौती के साथ बहस ख़त्म करती है। हर औरत को इस किरदार से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। पुष्पा छोटी छोटी बातों पर हार कर निराश नहीं होती, बल्कि हर चुनौती का हल निकालकर कुंदन सी निखर कर उभर आती है। पुष्पा के लिए ज़िंदगी जंग है और उसने जैसे हर जंग को जीतने की ठानी है। जिसमें उसके पास-पड़ोस के लोग किस तरह सहयोग देते है वो दिखाया गया है।

चाॅल में रहने वालों की समस्याएं, उनकी छोटी-छोटी चीज़ों में से खुशियाँ ढूँढने की कला, एक दूसरे के लिए समर्पित भाव, रूठना, मनाना और झगड़े हुबहू जीवन को परिभाषित करता है। अपने बच्चों की एक-एक खुशियों को पूरे करने की पुष्पा की जद्दोजहद, फिर भी बच्चों के मन में उठते कभी असंतोष तो कभी अपनी माँ के प्रति सौहार्द भाव दिल छू लेता है। टीन एज बेटी और गलत संगत के शिकार बेटे को संभालने का पुष्पा का हौसला काबिले तारीफ़ है।  

बापोद्रा चाॅल का हर छोटा-बड़ा किरदार दर्शक के दिमाग पर अपनी छाप छोड़ जाता है। एक किराना स्टोर वाले का पुष्पा को एक भाई की तरह कदम-कदम पर साथ देना और एक बुज़ुर्ग महिला राधा काकु का पुष्पा की हर छोटी बड़ी मुसीबतों का धैर्य से सामना करने हेतु शब्दों से ही हल ढूँढ कर देना नतमस्तक कर जाता है। कहाँ देखने को मिलता है ऐसा स्नेह आजकल, परिवार में भी एक दूसरे के प्रति समर्पित भाव नहीं दिख रहा। 

इस सीरियल को महज़ मनोरंजन के उदेश्य से न देखें तो बहुत से ऐसे पहलू है जो हमें जीवन जीने के तरीके सीखाती है। बड़े घराने में बेटे का रिश्ता तय करवाने के लिए पुष्पा की कोशिश, उसी घर में खाना पकाने जाना और उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के बीच की सोच का टकराव और बहस के बाद का समाधान, इन सारे द्रश्यो के बीच भी मनोरंजन नहीं छूटता। पुष्पा के किरदार को हर बात पर थोड़ा ऑवर रिएक्ट करते दिखाया है जो गुजराती लहजे में बड़बोलापन दिखाती है, पर मन समाधान कर लेता है की हाँ कुछ लोग होते है ऐसे भी मन में कुछ नहीं होता जो होता है प्रदर्शित कर देते है। 

पुष्पा का किरदार ज़िंदगी के हर लम्हों में जश्न ढूँढता है, इस दमदार अदाकारा के साथ सीरियल के सारे पात्रों ने अपनी तरफ़ से शत प्रतिशत दिया है। एक-एक किरदार से असलियत झलकती है। hats off प्रोडक्शन को दर्शकों की ओर से hats off कहना तो बनता है।

कुल मिलाकर ये सीरियल सास बहू के षडयंत्र और गाली गलोच और हिंसा से परे मनोरंजन के साथ ज़िंदगी के फ़लसफे को समझाने लायक बनाने की कोशिश की गई है। अब आगे घर में बहू आने पर वही ट्रेक न पकड़ कर इसी तरह से आगे बढ़ती रहेगी तो हमलोग, बुनियाद और नुक्कड़ की तरह इस युग की एक यादगार धारावाहिक बनकर रहेगी इसमें कोई दो राय नहीं। अभी तो शुरुआत है, आगे-आगे देखिए होता है क्या। पर हर औरत को पुष्पा के किरदार से प्रेरणा लेकर आत्मविश्वासी बनने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। 

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर


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