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Jayshree_birmi, poem

हालात- जयश्री बिरमी

हालात मिलाना हाथ मुश्किल हैं बहुतगले लगाने की बात ही न कीजिएघूमने की ख्वाहिश बहुत हैंमगर बाहर निकलने की बात …


हालात

हालात- जयश्री बिरमी
मिलाना हाथ मुश्किल हैं बहुत
गले लगाने की बात ही न कीजिए
घूमने की ख्वाहिश बहुत हैं
मगर बाहर निकलने की बात ही न कीजिए

ठंड हैं बहुत बाहर धूप में
सुस्ताने की बात ही न कीजिए
खुली हवा बह रही हैं बहुत
मास्क हटाने की बात ही न कीजिए

खुल के सांस लेने की जुर्रत
ही न कीजिए
दिवाली गई खाली,लोहरी भी थी भारी
होली को तो मानने की बात ही न कीजिए

पतंग को उड़ने की भी बात
न कीजिए
रुकी हुई खुदाई हैं जो दो सालों से
अब आगे क्या होगा ये बात ही न कीजिए

बस सब कुछ ही कर लो
लेकिन सामाजिक दूरी हटाने की
बात ही न कीजिए
मुख पट्टी निकलने की बात न कीजिए
हाथ मिलाने की या गले से लगाने की बात
न कीजिए
मिलने मिलाने की बात ही न कीजिए

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


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