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हवाओं से बात- डॉ. माध्वी बोरसे!

हवाओं से बात! सनन सनन सी हवा मैं सांस लेते हुए खुलकर, जीते हैं अपने सारे दुख गम को भूल …


हवाओं से बात!

हवाओं से बात- डॉ. माध्वी बोरसे!
सनन सनन सी हवा मैं सांस लेते हुए खुलकर,

जीते हैं अपने सारे दुख गम को भूल कर,
जिंदगी बहुत अजीज है यारों,
मजा लेते हैं हर पल का, ठंडी ठंडी हवा में घुल कर!

लहराए स्वयं को, इस ठंडी हवा के झोंके में,
क्यों इतने समय से, तू अपने मन को रोके हे,
आजाद हो जा खुले पंछी की तरह,
देख, इस प्रकृति के रूप अनोखे हैं!

इस हवा की खुशबू में, चलो हम सब भी खोते हैं,
अपनी जिंदगी को, महक से संजोते हैं,
हरियाली लाए, हरियाली में जाए,
लहराए हवाओं की तरह, क्यों ज्यादा सोचते हैं!

सनन सनन सी हवा मैं सांस लेते हुए खुलकर,
जीते हैं अपने सारे दुख गम को भूल कर,
जिंदगी बहुत अजीज है यारों,
मजा लेते हैं हर पल का, ठंडी ठंडी हवा में घुल कर!

डॉ. माध्वी बोरसे!
( स्वरचित व मौलिक रचना)
राजस्थान (रावतभाटा)


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