Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh

हमारे पवित्र सोलह संस्कार- जयश्री बिरमी

हमारे पवित्र सोलह संस्कार हिंदू धर्म कोई व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं हैं,ये प्राचीन काल से आस्थाएं और ऋषि …


हमारे पवित्र सोलह संस्कार

हमारे पवित्र सोलह संस्कार- जयश्री बिरमी
हिंदू धर्म कोई व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं हैं,ये प्राचीन काल से आस्थाएं और ऋषि मुनियों द्वारा संचित अनुभव और तथ्यों के आधार पर किया समुच्चय हैं। जिसमें स्वस्थ और सामाजिक जीवन यापन के लिए जरूरी रीति और रिवाजों का वर्णन किया गया हैं।कोई एक व्यक्ति द्वारा सूचित पथ पर चलने की सिख नहीं हैं,तथ्यात्मक व्यवहार या बरताव के साथ चलना हैं।महर्षि वेदव्यास के अनुसार सभी सनातनियों को १६ संस्कारों से संपन्न किया जाता हैं।

१. गर्भाधान एक संस्कार ही हैं जो आज के युग में सब को कुछ अलग सा लगेगा लेकिन आज भी सब उस संस्कार के महत्व को समाज कर गर्भाधान के लिए उचित व्यवहारों को महत्व देते हैं,उसके लिए प्रकाशित साहित्य, टैप या वीडियो द्वारा अपने आप को प्रशिक्षित करते हैं।गर्भाधान के लिए स्त्री– पुरुष दोनों को प्रसन्न चित्त ,उत्साहित और स्वस्थ रहना आवश्यक हैं।जो संतति माता पिता के रज और वीर्य से उत्पन्न होती हैं उसके योग्य विकास, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए संस्कार किए जाते हैं।

विधिपूर्वक किए गया संस्कार से संतति सुयोग्य और अच्छी प्राप्त होती हैं।

२. पुंसवन संस्कार गर्भाधान के तीन महीने बाद किया जाता हैं जिसमे प्रथम तीन महीनों में शिशु का मस्तक विकसित होना शुरू हो जाता हैं,और साबित हुआ हो या नहीं किंतु गर्भ में ही शिशु का शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास या दिमाग का विकास भी होने की वजह से वह गर्भ में की सीखना शुरू कर देता हैं।ये प्रचलित हैं कि अभिमन्यु ने चक्रर्व्यूह का सारा ज्ञान अपनी मां के गर्भ में ही पाया था।

३. सीमंतोन्नयन(गोदभराई) जो गर्भ के पांचवें, सातवें और नौवें महीने में किया जाता हैं।गर्भ में पल रहा बच्चा काफी सीखने के लिए तैयार हो जाता हैं।इसलिए उसमें अच्छे गुणों का विकास हो इस आशय से माता अच्छे अचार–विचार ,रहन–सहन और व्यवहार को प्रधान्य दे उसे सुसंस्कृत करती हैं।माता प्रसन्नचित रह कर ध्यान धर्म और अध्यन में समय बिताकर क्लैश और मानसिक तनाव से दूर रेहाना चाहिए।

सामाजिक तरीके से देखें तो संतति के आगमन की सूचना संबंधियों और मित्रों को इस संस्कार को मनाके के एसएमडीआई जाती हैं।

४. जातकर्म संस्कार से शिशु को दुनियां ने आने का ज्ञान हो चुका होता हैं तो उसे आगमन से अवगत कराने के लिए उसे शहद चटाया जाता हैं जिसे प्रांतीय भाषाओं के हिसाब से अलग अलग नाम दिए गए हैं,जैसे गुड़थी,गलथुठी आदि।वैदिक मंत्रों द्वारा बच्चे के स्वास्थ्य और दीर्घायु होने की प्रार्थना की जाती हैं।

५. नामकरण का संस्कार सामान्यत: छट्ठे या ग्याहर्वे दिन मनाया जाता हैं। जिसमें एक नवजात शिशु जिसका कोई नाम नहीं हैं उसे नाम दे कर पहचान दी जाती हैं।नाम सामान्यत: उसकी राशि में आए हुए अक्षरों से शुरू हो वैसा तय लिया जाता हैं।सामान्य: सकारात्मक अर्थ वाला नाम रखा जाता हैं,नकारात्मक या अर्थहीन नाम रखने से बचा जाता हैं,किंतु आजकल फैशन वश लोग वैसे नाम भी रख दिया करते हैं।सगर्भित नाम का असर उम्रभर बच्चे के साथ रहता हैं।वैसे नाम वो चीज हैं जो आजीवन या कभी जिंदगी के बाद भी जिंदा रहता हैं लेकिन ये दूसरों की पसंद का होता हैं।

६. निष्क्रमण में शिशु को बाहर निकाला जाता हैं।शरीर जिस पंच महाभूतों से बना हैं,पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश आदि से परिचय हेतु बाहर निकाला जाता हैं।और उसी पांच महाभुतों से शिशु के कल्याण और दीर्घायु के लिए प्रार्थना की जाती हैं।

७. अन्नप्राशन संस्कार में बच ही को आहार से परिचित किया जाता हैं।६–७ महीनों में खाना खाने के लिए के लिए तैयार हो जाता हैं।शिशु के पचनकार्य के अवयव अब खाना पचाने के लिए सक्षम हो गए होते हैं तो उन्हें पाचन में हल्की फुल्की और पौष्टिक बानगी खिला सकते हैं।

८. चूड़ाकर्म ( मुंडन)संस्कार में शिशु जिस बालों के साथ जन्म लेता हैं उन्हे हटा दिया जाता हैं।जो बालक के ११महीने में,तीन साल में,पांच साल में या सात साल में मुंडन कर हटाए जा सकते हैं।पहले के जमाने में तो उनके छोटे दिमागवाले हिस्से में चोटी रखी जाती थी जिससे उन्हें ज्ञान प्राप्त करने मदद मिलती थी ऐसा माना जाता था।और जन्म समय से अगर उसके बालों में कोई जीवाणुं बचे हो तो वह भी बालों के साथ निकल जाते हैं।

९. कर्णवेध में बालक हो या बालिका दोनों का कर्णवेध होता था जो आज सिर्फ बालिकाओं का ही होता हैं। शास्त्रों के हिसाब से कर्णवेध से रही केतु के बुरे प्रभाव से बचाव होता हैं और एक्यूप्रेशर के हिसाब से मस्तिष्क में जाने वाली नसों में रक्त प्रवाह ठीक होने से दिमाग को खून ज्यादा मिलता हैं और श्रवण शक्ति भी बढ़ जाती हैं,कई रोगों की रोकथाम भी हो जाती हैं।इन से यौन इंद्रीयां भी पुष्ट होती हैं

१०विद्यारंभ संस्कार द्वारा जब बालक बोलना सीखता हैं तब प्रारंभिक शिक्षा देने के लिए अक्षर बोध करवाया जाता था, जीस में माता पिता या गुरुओं द्वारा मौखिक रूप से श्लोक और पौराणिक कथाएं आदि से परिचित कराया जाता था ताकि गुरुओं के पास जाने से पहले ही वे इन सभी से परिचित हो जाएं और आगे अभ्यास में सुविधा रहें।

११ यज्ञोपवित जिसे उपनयन या जनेऊ संस्कार भी कहते हैं।इस संस्कार में जब शिशु गुरु के पास अभ्यास के लिए जाता हैं ये भाव व्यक्त किया जाता हैं जो ७ से १० साल तक की उम्र में यज्ञोपवित धारण करवाया जाता हैं।उनको अभ्यास के दौरान ब्राह्म्मचर्य का पालन कर शिक्षा ग्रहण करने के मंत्रो से पूर्ण किया जाता हैं।बालक कोTइन सूत्र वाला जनेऊ पहनाया जाता हैं।ये तीन सूत्र ब्रह्मा,विष्णु और महेश के प्रतीक हैं।इस संस्कार से बालक को बल,ऊर्जा मिलती हैं और आध्यात्मिक भावों की जागृति होती भी होती हैं।

११. वेदारंभ के संस्कार से बालक को वेदों की पहचान करवा विद्यारंभ होता हैं।पहले के जमाने में वेदों द्वारा ही सभी विद्याएं दी जाती हैं।

१२.

यज्ञोपवित के बाद बाद बालकों को वेदाभ्यास के लिए गुरुकुल भेजा जाता था।वेदारंभ से पहले गुरु अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य के पालन का व्रत का पालन कर संयमित जीवन जीने की शिक्षा देते थे। असंयमित जीवन जीने वालों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं होता था।

१३.केशांत जो गुरुकुल की शिक्षा उपरांत संपन्न होने वाला संस्कार हैं।गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का संस्कार हैं।जिसमे स्नान करवाके स्नातक की उपाधि भी दी जाती हैं ।

१४. समावर्तन में ब्रह्मचर्य का मेखला और दंड छोड़ जो यज्ञोपवित के समय धारण किया था उसे छोड़ देता हैं।

१५. विवाह ये स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अति महत्वपूर्ण संस्कार हैं। वेदाभ्यास के पर्यंत जो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन के बाद वह गृहस्थ जीवन जीने के लिए गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए विवाह संस्कार दिया जाता हैं ,जहां स्त्री और पुरुष वैदिक मंत्रों को साक्ष्य रख कर अग्नि के सात फेरें ले ,एक दूसरे का सात जन्म के लिए साथ देने के लिए वचन बद्ध होते हैं।वैसे विवाह ८ प्रकार के होते हैं।

१६.अंत्येष्ठि अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता हैं।धर्म शास्त्रों की मान्यता अनुसार मृत शरीर को विधिवत क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनाएं शांत हो जाती हैं।मृतक की आत्मा को मोक्ष एवम शांति मिले इस हेतु से वैधानिक विधि से अंत्येष्टि की जाती हैं।

वैसे संस्कार का अर्थ किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत करना जिससे वह श्रेष्ठ बन विकृत वस्तु विशेष से दूर हो अपने संस्कारों का पालन करें और जीवन पथ को सरलता से पूरा करें।संस्कार के पालन से मानसिक और शारीरिक आरोग्य प्राप्त होता है।और जीवन में समायोजन से आपसी रिश्तों में भी मिठास आती हैं।

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद


Related Posts

आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 ज़ारी | RBI annual report 2022-23 released

June 1, 2023

आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 ज़ारी आरबीआई वार्षिक रिपोर्ट 22-23 में मज़बूत आर्थिक नीतियों, 500 रू के नकली नोट, फ्रॉड

मिल मजदूर : सिनेमा का ‘प्रेम’ और साहित्य का ‘चंद’ | Mill worker: ‘Prem’ of cinema and ‘Chand’ of literature

June 1, 2023

सुपरहिट मिल मजदूर : सिनेमा का ‘प्रेम’ और साहित्य का ‘चंद’ धनपतराय श्रीवास्तव की परेशानी 8 साल की उम्र से

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा डाटा जारी – जीडीपी रफ़्तार 7.2 फ़ीसदी की दर से बढ़ी | Data released by National Statistical Office (NSO)

June 1, 2023

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा डाटा जारी – जीडीपी रफ़्तार 7.2 फ़ीसदी की दर से बढ़ी भारत के विज़न 2047

विश्व तंबाकू निषेध दिवस 31 मई 2023 पर विशेष

May 30, 2023

विश्व तंबाकू निषेध दिवस 31 मई 2023 पर विशेष आओ तंबाकू का सेवन छोड़ने की प्रतिबद्धता का संकल्प करें तंबाकू

पीयूष गोयल ने लिखी दर्पण छवि में हाथ से लिखी १७ पुस्तकें |

May 30, 2023

पीयूष गोयल ने लिखी दर्पण छवि में हाथ से लिखी १७ पुस्तकें |17 hand written books written by Piyush Goyal

नया संसद भवन राष्ट्र को समर्पित |

May 30, 2023

नया संसद भवन राष्ट्र को समर्पित भारत दुनियां का सबसे बड़ा तो अमेरिका सबसे पुराना लोकतंत्र है  पूरी दुनियां भारत

PreviousNext

Leave a Comment