Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

kishan bhavnani, lekh

स्वीट आतंकवाद,सोशल इंजीनियरिंग

स्वीट आतंकवाद,सोशल इंजीनियरिंग क्या वर्तमान आधुनिक डिजिटल नए भारत में सोशल इंजीनियरिंग और स्वीट आतंकवाद से जीत का आधार बनाने …


स्वीट आतंकवाद,सोशल इंजीनियरिंग

स्वीट आतंकवाद,सोशल इंजीनियरिंग

क्या वर्तमान आधुनिक डिजिटल नए भारत में सोशल इंजीनियरिंग और स्वीट आतंकवाद से जीत का आधार बनाने की रणनीति कामयाब होगी ??

क्या भारतीय चुनावी समीकरणों में बढ़ता जातिगत गणित कहीं धर्म, जाति, समुदायों में टकराव का कारण तो नहीं बनेगा??- एड किशन भावनानी

गोंदिया – विश्व के सबसे बड़े प्रतिष्ठित और ताकतवर लोकतंत्र भारत में 10 फ़रवरी से 10 मार्च 2022 तक एक लोकतांत्रिक पर्व उत्सव के रूप में पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं जिसका दिनांक 20 फ़रवरी 2022 को पंजाब में एक चरण में पूरी सीटों और यूपी के तीसरे चरण के चुनाव की प्रक्रिया पूरी हुई। परंतु दोनों जगह वोटिंग प्रतिशत साधारण रहा जबकि 70-80 फ़ीसदी से अधिक वोटिंग प्रतिशत रहता तो एक फक्र वाली बात थी फ़िर भी जिन्होंने अपने मताधिकार का उपयोग किया उन्हें बधाई!!!
साथियों भारतीय प्रतिष्ठित लोकतंत्र पर्व को दशकों पहले और आज की स्थिति की अगर तुलना करें तो हमें एक बहुत बड़ा अंतर दिखाई देगा!!! पहले चुनाव चिन्ह को बहुत अधिक महत्व दिया जाता था और हम बचपन में किस तरह छोटी लकड़ी से चिपके उस चुनाव चिन्ह को हाथ में लेकर घूमते थे वह मनमौजी अनुभव ही अलग था!! जिसका स्थान अभी वर्तमान आधुनिक डिजिटल युग में सोशल इंजीनियरिंग याने, राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग शब्द का इस्तेमाल तब होता है, जब चुनाव में एक खास धर्म, जाति और समुदाय के वोटरों को एकजुट करने के लिए उनके समाज से जुड़े नेताओं को मौका दिया जाता है, उन्हें चुनाव लड़ाया जाता है इस स्थिति में ग्रहण कर लिया है।
साथियों बात अगर हम भारतीय चुनावी समीकरणों में बदलते परिवेश जातिगत गणित की करें तो कहीं यह धर्म, जाति,समुदायों में टकराव का कारण तो नहीं बन जाएगा ?? यह विचार रेखांकित कर इसको अति संजीदगी और गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है जिस प्रकार हम वर्तमान में देश के बहुत बड़े राज्य में तीन चुनावी चरणों में सोशल इंजीनियरिंग का गणित, नेताओं के भाषणों में आरोप प्रत्यारोप, शाब्दिक कटु बाण, शाब्दिक तीखे वार पलटवार, चुनावी गर्मी ठंडक देख रहे हैं, यह आम नागरिक जिसके मन में यदि दूर-दूर तक भी किसी जाति, समुदाय, धर्म की आशंका नहीं होगी यह माहौल देखकर ज़रूर उसके मन में यह जाती, प्रजाति, धर्म का बीज अंकुरित हो सकने की संभावना है।
साथियों बात अगर हम पिछले दिनों से नेताओं के शाब्दिक बाणों में आतंकवाद, स्वीट आतंकवाद, स्वतंत्र देश का पीएम, अलगाववाद संपर्क, दंगों में आरोपियों के केस वापस लेने, चुनाव चिन्ह पर बम रखकर विस्फोट करने पर आश्चर्य व्यक्ति करना इत्यादि अनेक बातों और राजनीतिक पार्टियों द्वारा उन मुद्दों को लपक कर उसका रिप्लाई प्रेस कॉन्फ्रेंस, टवीट्स, वीडियो क्लिप, इत्यादि साधनों से देना जैसे, टिप्पणी का भी जवाब दिया, कि शायद मैं दुनिया का सबसे स्वीट आतंकवादी हूं, जो सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनवाता है, फ्री बिजली देता हूं, एक नेता ने ट्वीट करते हुए सवाल करते हुए कहा है कि वो सीधा जवाब दे दो कि कवि सच कह रहे हैं ? हां या ना??, चुनावी सभाओं में 7 मार्च 2006 में काशी संकटमोचक मंदिर में बम धमाका आरोपियों को 5 मार्च 2013 को केस वापस लेने का मुद्दा, 2007 में गोरखपुर बम धमाकों आरोपियों के केस वापस ले का मुद्दा जिसे कोर्ट ने इनकार किया और 20 साल की सजा हुई, 26 जुलाई 2008 को गुजरात बम धमाका जिसमें बमों को रखने का चुनाव चिन्ह का हवाला इत्यादि अनेक मुद्दे हमें पिछले एक-दो दिनों से अनेक टीवी चैनलों पर चुनावी चरण में सुनने को मिले। इसमें हमें धर्म, जाति, समुदाय में भाईचारा बढ़ेगा?? या टकराव बढ़ेगा?? बात समझ से परे है??
साथियों बात अगर हम सोशल इंजीनियरिंग को समझने की करें तो, चुनाव में सोशल इंजीनियरों की भूमिका काफी अहम हो गई है। भले ही ये राजनेता अपनी पार्टी का प्रमुख चेहरा नहीं होते हैं, लेकिन वे एक ऐसा फॉर्मूला तैयार कर देते हैं, जिससे दल को चुनाव में जीत दिलाने में कामयाबी मिलती है। जमीन पर स्थिति का जायजा लेकर वे अपने प्रमुख राजनेताओं को इनपुट देते हैं, जिसके आधार पर चुनावी मुद्दों में लगातार बदलाव होता है। नए-नए बयानों के सामने आने की भी वज़ह कई बार इन सोशल इंजीनियर्स का का इनपुट बनता है। इसलिए, वर्तमान समय में सोशल इंजीनियर्स हर दल में देखे जा सकते हैं।
देश के सबसे बड़े राज्य के चुनाव में उनकी भूमिका साफ दिख रही है। ऐसा माना जाता है कि अगर इस राज्य में चुनाव जीतना है तो अच्छी सोशल इंजीनियरिंग होनी ज़रूरी है। मतलब ज्यादा से ज्यादा जातियों के लोगों को अपने पाले में लाना होगा। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों का चयन इसी तर्ज पर करने की कोशिश की है, जिसमें जाति के गणित का खास ध्यान रखा गया है।
साथियों बात अगर हम आतंकवाद के शाब्दिक संदर्भ की करें तो जिसकी इंट्री नेताओं के शाब्दिक बाणों में अभी अभी के दिनों से दिख रही है।वैसे आतंकवाद की परिभाषा वर्ष 2005 में संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने आतंकवाद को लोगों को भयभीत करने अथवा सरकार या किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन को कोई कार्य करने अथवा नहीं करने के लिये बाध्य किये जाने के प्रयोजन से नागरिकों अथवा निहत्थे लोगों को मारने अथवा गंभीर शारीरिक क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से किये गए किसी कार्य के रूप में परिभाषित किया। वैसे देखा जाएतो वर्तमान समय में आतंकवाद भारत की प्रमुख सबसे बड़ी समस्या है, जिसने भारतीय शासन-व्यवस्था को संघर्षशित कर दिया है। आतंकवाद ने भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि परिस्थितियों को प्रभावित किया है। अत: इसे दूर करना अत्यधिक आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम हाल ही में आए बयानों की करें तो इस शब्द को एक दूसरे के खिलाफ उपयोग किया जा रहा है परंतु उन्हें रोटी फिल्म का यह गाना याद रखना चाहिए!!!,, ये तो पब्लिक है यह सब जानती है ये तो पब्लिक है,, अजी अंदर क्या है,, और बाहर क्या है यह सब पहचानती है,, ये जो पब्लिक है यह सब जानती है,, यह चाहे तो सर पर बिठा दे, चाहे फेंक दे नीचे,, पहले ये पीछे भागो, फिर भागो इसके पीछे, दिल टूटे यह रुठे तो तौबा कहां फिर मानती है ये तो पब्लिक है सब जानती है यह तो पब्लिक है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि स्वीट आतंकवाद, सोशल इंजीनियरिंग!!! क्या वर्तमान आधुनिक डिजिटल भारत में सोशल इंजीनियरिंग और स्वीट आतंकवाद जीत का आधार बनाने की रणनीति कामयाब होगी?? क्या भारतीय चुनावी समीकरणों में बढ़ते जातिगत गणित कहीं धर्म, जाति, समुदाय का आपस में टकराव का कारण तो नहीं बन जाएंगे?? इसको रेखांकित करना तात्कालिक ज़रूरी है।

संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ 

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्

Related Posts

Awaz uthana kitna jaruri hai?

Awaz uthana kitna jaruri hai?

December 20, 2020

Awaz uthana kitna jaruri hai?(आवाज़ उठाना कितना जरूरी है ?) आवाज़ उठाना कितना जरूरी है ये बस वही समझ सकता

azadi aur hm-lekh

November 30, 2020

azadi aur hm-lekh आज मौजूदा देश की हालात देखते हुए यह लिखना पड़ रहा है की ग्राम प्रधान से लेकर

Previous

Leave a Comment