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सूरज दादा- विजय लक्ष्मी पाण्डेय

सूरज दादा सूरज दादा उठा के गठरी, चले कुम्भ के मेला में।बसन्त पंचमी नहा केआउँ,दिन बीता बहुत झमेला में।।लुका छिपी …


सूरज दादा

सूरज दादा- विजय लक्ष्मी पाण्डेय
सूरज दादा उठा के गठरी,

चले कुम्भ के मेला में।
बसन्त पंचमी नहा केआउँ,
दिन बीता बहुत झमेला में।।
लुका छिपी कर चंदा जाए,
लिए बिछौना तारों की।
साथ चली है बरखा रानी,
है टोली ये मस्तानों की।।
खेत बाग़ वन कुम्भ नहाते,
ठिठुर रहा है घर आँगन।
नन्हें-नन्हें नौनिहाल,
बेहाल हुए सूरज दादा बिन।।
साथ हवाएँ चली बसन्ती,
गंगा ,सरयू, हरिद्वार तट ।
एक साथ सब कुंभ नहाते,
हर-हर गंगे महादेव कर।।
तिलक लगाकर सिंदूरी,
वह सूरज दादा है आया।
मुदित दिशाएँ महक उठीं,
खुशनुमा भव्य कंचन काया।।
दे ताशे,ताल, ढोल,झाँझरी,
बजा बजा रंग बरसाऊँ।
कुम्भ नहा सूरज आया है,
उत्सव”विजय”फागुनी गाऊँ।।

विजय लक्ष्मी पाण्डेय
एम. ए., बी.एड.(हिन्दी)
स्वरचित मौलिक रचना
आजमगढ़,उत्तर प्रदेश


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