Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, Veena_advani

साहित्य जगत मंचों पर संस्थापकों की चाल- साहित्यकाराओं का शोषण

साहित्य जगत मंचों पर संस्थापकों की चाल- साहित्यकाराओं का शोषण सही कह रही हूं, शब्द बहुत ही कड़वे हैं मेरे …


साहित्य जगत मंचों पर संस्थापकों की चाल- साहित्यकाराओं का शोषण

सही कह रही हूं, शब्द बहुत ही कड़वे हैं मेरे जहर से भरे परंतु हकीकत और सच्चाई से भरे हुए हैं। मुझे यकीन है मेरे शब्दों के तीर पुरूष संस्थापकों के दिलों को चीर जाएंगे हो सकता है मेरे शब्दों का विरोध भी हो फिर भी मानवाधिकार के चलते मैं अपनी बात रख सकती हूं। कुछ वर्षों पहले में भी साहित्यिक मंचों की पदाधिकारी थी अभी भी हूं परंतु मंचों की गतिविधियों पर निरंतर मेरी रूची, धीरे-धीरे अभीरूची में तब्दील हो गई है। कारण इसका सिर्फ एक है शोषण, कहने का मतलब मेरा यह है कि बहुत से साहित्यिक मंचों को पुरूषों ने बनाया और इसके अंतर्गत पूरे देश भर से बहुत सी साहित्य से संबंधित महिलाओं को जोड़ा। खुशी भी हुई कि सह सम्मान हमें मंचों पर जोड़ा गया। परंतु धीरे धीरे हर मंच पर महिलाओं को पदाधिकारी भी बनाया गया। महिलाएं भी प्रसन्न, जैसे कुछ वर्ष पूर्व में स्वयं होती थी कोई पद् पाकर साहित्यक मंचों पर गौरवान्वित महसूस करती थी। ठीक उसी तरह महिलाओं को पद् विशेष दिये जाते और उन्हें पदानुसार कार्य भार सौंपा जाता। कोई अध्यक्ष, कोई उपाध्यक्ष, सचिव महासचिव, संचालन कर्ता वगैरह-वगैरह। हम महिलाएं खुश हो जाती है सम्मानित पद पाकर। पर क्या आपने सोचा है कि आपका समयानुसार शुरू-शुरू मे तो कार्यभार कम, परंतु वक्त के ढ़लते अनुसार आप पर कार्यभार को निरंतर बढ़ाया जाता है। परिवार संग महिलाओं पर साहित्य पटलों की जिम्मेदारी के चलते थकावट, शिथिलता महसूस होती है। इस बीच एक विशेष परिवर्तन की ओर शायद आप सभी का ध्यान गया या नहीं गया परंतु जब मेरा ध्यान गया था तो मेरी अरूची निरंतर बढ़ती चली गई साहित्य पदों के प्रति। वो परिवर्तन यह है कि पुरूष प्रधान जिसे अपने परिवार के प्रति पूरी आर्थिक जिम्मेदारी का निर्वहन करना ही है वो तो स्वयं अपने आर्थिक आय के लिए जद्दोजहद कर रहा होता। पटलों पर विशेष ध्यान नहीं देते और महिलाओं को पदों का तमगा पहनाकर शोषण करते। महिलाएं मंचों को भली भांति भी चलाती। कभी कभी अपने परिवार के कार्यों को भी नजरंदाज करना पड़ता उसे। मानती हूं हम महिलाओं को भी अपनी एक पहचान मिलती। परंतु पहचान के लिए कार्यभार इतना अधिक की हमारे घरों में भी, हर किसी के तो नहीं, कुछ एक के घरों में विरोधाभास भी होने लगता की क्या दिन भर लगी रहती साहित्य पटलों पर।
जब एक दो बरस गुज़र जाते तो एक ओर बढ़ा और विशेष परिवर्तन ने मुझे हतप्रभ में डाला था कभी। हमारी रचनाओं के लिए विशेष विषय भी पटलों पर दिया जाता और इन्हीं विषयों पर हम सभी कलम भी चलाते। हमारे ही कविताओं को कार्यक्रम में अध्यक्ष, संचालन कर्ता महिलाओं के द्वारा आनलाईन लिया जाता और हमारी ही रचनाओं का पीडीएफ बना उनको साहित्य पुस्तक के रूप में परिवर्तित कर, चालाक संचालन कर्ता द्वारा अपने नाम पर पुस्तक भी जारी कर दी जाती। काशी के एक मंच पर जो बहुत ही
अधिक शोषण हो रहा पुरुष साहित्यकार द्वारा महिलाओं का परंतु खैर हमारा क्या जाता यही सोच चुप रह जाती। पुरूष प्रधान स्वयं तो आर्थिक आय के लिए बाहर हाथ पैर मारते और उनको कोई ना कोई संसाधन मिल भी जाता, या पुश्तैनी संसाधन होता ही है। परंतु हम बहुत सी साहित्यकार महिलाएं बाहर भी काम करती, घर का भी और साहित्य पटलों पर भी अपना पदों की चाह मे शोषण करवातीं। हमारी ही रचनाओं की पुस्तकों का पीडीएफ बना आज कल बढ़ चढ़ कर इंस्टाग्राम वगैरह-वगैरह साईट पर डाला जा रहा जहां कमाई का मोटा जरिया है।
हाल ही में मात्र कुछ माह पूर्व बने मंचों पर मैंने जुड़ स्वयं देखा है कि पुरूषों ने मंच बना रखे हैं और नव साहित्यिकाराऐं जो हाल ही मे साहित्य जगत मे उतरी हैं। उनका बहुत अधिक हनन हो रहा है। नव साहित्यिकाराऐं अपनी पहचान बनाने के लिए दिन भर मंचों पर एकाग्र हो कार्य कर रही, जिनकी लेखन शैली नव आगंतुकों जैसी है उन्हीं का शोषण सर्वाधिक हो रहा इंस्टाग्राम ग्रुप में भी वो अपनी जिम्मेदारी निभा रही, वाट्स अप पर भी और फेसबुक पर भी। धीरे-धीरे यही पुरुष आय के साधन में बढ़त के लिए साझा पुस्तक भी बनाने का कार्य कर रहे हैं जिसमें कविता भी मंच के सदस्यों का, पैसा भी उनका ओर तो ओर मेहनत भी महिलाओं की। बस पुस्तक बनी मुफ्त में उसके संपादक बनने का फायदा, विभिन्न वेबसाइटों पर बेचके कमाई भी इनकी, साथ ही साथ मेहनत भी नहीं करनी पड़ी। अरे मेहनत करने वाली महिलाएं जो हैं पुरुषों के लिए जो बैठे बिठाए पद् देकर कमा रहे और महिला साहित्यकाराऐं अपना शोषण करवा रही और यही सोच खुश हो रही की हमारा बहुत नाम है लोग हमारी कितनी बात मानते वगैरह-वगैरह। दिन भर की मेहनत नव साहित्यिकाराऐं कर रही और पुरूष प्रधान अपनी आय का जरिया विभिन्न वेबसाइटों के जरिए इन नव साहित्यिकाराओं का शोषण कर, कर रहे हैं। सिर्फ साहित्य मंचों पर पदों को देकर। साहित्यकार महिलाएं, नव आगंतुक साहित्यकाराऐं बन रही शोषण का शिकार। कुछ महिलाएं भी देखी हैं जो मोटी-मोटी आय कमा रही महिला साहित्यकाराओं को पद् का लालच देकर। हम इन सबकी तो कमाई का जरिया बन रहे परंतु दिन भर खुद को खपा कर, अपने घर की जिम्मेदारी का निर्वहन कर के, या अपने घर के सदस्यों के विरोध के विरूद्ध जा कर सब कर रहें परंतु आज तक ये कभी ना सुना की शोषित हो रही महिलाओं को कोई आय मिल सके। वो तो मुफ्त मे इस्तेमाल हुई जा रही हैं या कुछ सिर्फ नाम की चाह में खुद का शोषण करवा रही हैं। आशा नहीं विश्वास है मेरे शब्द कानों में चुभेंगे। परंतु सच लिखना, बेबाक लिखना मेरी कलम में भरा है। आप आगे बढ़े, बढ़ते रहें आपको पीछे धकेलना मेरी सोच नहीं। परंतु आपके हो रहे लगातार हनन की ओर सतर्क कर ध्यान दिलवाना मेरा मकसद। जो मुझे दिखा, जो मैंने सीखा वही सिखाया।

About author

Veena advani
वीना आडवाणी तन्वी
नागपुर , महाराष्ट्र

Related Posts

कुछ भी, सब कुछ नहीं!

April 20, 2022

कुछ भी, सब कुछ नहीं! अक्सर हमने देखा है, कि हम सब कभी कभार यह कहते हैं, यह मेरा सब

अपनी किस्मत अपने हाथ!

April 20, 2022

अपनी किस्मत अपने हाथ! जुआरी करते हैं,किस्मत की आजमाइश,निकम्मे करते हैं,बैठे-बैठे फरमाइश,पर जीवन की हकीकत,परिश्रम करने से ही होती हैपूरी,

भारत की गाथा

April 20, 2022

भारत की गाथा प्रधानमंत्री संग्रहालय – स्वतंत्रता के बाद सभी प्रधानमंत्रियों के जीवन और योगदान पर लिखी भारत की गाथा

हमारी आस्था, संस्कृति की धारा, सद्भाव, समभाव, समावेश की है

April 20, 2022

हमारी आस्था, संस्कृति की धारा, सद्भाव, समभाव, समावेश की है देश की बुनियादी नीव अमन चैन, सौहार्दपूर्ण वातावरण, भाईचारा तात्कालिक

आजकल संतति से विमुख हो रहे हैं युवा

April 20, 2022

आजकल संतति से विमुख हो रहे हैं युवा जब हम लोग छोटे थे तो सभी घरों में एक ही रिवाज

चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए हमें सीमाओं को मजबूत रखना होगा।

April 20, 2022

चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए हमें सीमाओं को मजबूत रखना होगा। 1970 और 80 के दशक में चीन और पाकिस्तान

Leave a Comment