Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jitendra_Kabir, poem

सभ्यता का कलंक

 सभ्यता का कलंक जितेन्द्र ‘कबीर’ बंदरों के झुंड का सरदार अपनी शारीरिक शक्ति के बल पर संसर्ग करता है अपने …


 सभ्यता का कलंक

जितेन्द्र 'कबीर'
जितेन्द्र ‘कबीर’

बंदरों के झुंड का सरदार

अपनी शारीरिक शक्ति के बल पर

संसर्ग करता है

अपने झुंड की सभी मादाओं के साथ,

सिर्फ अपनी यौन-क्षुधा की ही

तृप्ति के लिए नहीं

बल्कि झुंड पर अपना बर्चस्व

स्थापित करने के लिए भी,

युद्ध में हारे हुए राजा की प्रजा को

गुलाम अथवा यौन-गुलाम बना कर रखने का

भी इतिहास रहा है दुनिया में,

हथियारबंद पुरुष,

एक सैनिक के रूप में हो,

आतंकी के रूप में हो,

दंगाई के रूप में हो

या फिर किसी भी ऐसे रूप अथवा परिस्थिति में हो

जिसमें उसे सजा का डर न हो,

समाज का डर न हो

स्वयं को अथवा उसके परिवार को नुक्सान

का डर न हो

तो चुन लेता है बहुत बार

सामने पड़ गई स्त्री की मजबूरी का फायदा उठा

उसके ऊपर बलात्कार करना,

सिर्फ यौन-क्षुधा की तृप्ति के लिए नहीं

बल्कि नारी जाति पर अपना

बर्चस्व स्थापित करने के लिए भी,

अपनी सांस्कृतिक मूल्यों एवं श्रेष्ठता के

तमाम दावों के बावजूद

स्त्री जाति पर लगातार बढ़ते यौन हमले

हमारे समाज में मौजूद पशु-प्रवृति के

जीते-जागते सबूत हैं,

धन-बल-पद-चालाकी-झूठ के बलबूते

किसी स्त्री से संबंध बना लेने को

अपनी जीत समझना

हमारी सभ्यता के माथे पर सबसे बड़ा

कलंक है।

                                जितेन्द्र ‘कबीर’

यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है।

साहित्यिक नाम – जितेन्द्र ‘कबीर’

संप्रति- अध्यापक

पता – जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

संपर्क सूत्र – 7018558314


Related Posts

जिंदगी तो है बहता झरना/zindagi to hai bahta jharna

August 2, 2022

जिंदगी तो है बहता झरना कितनी सारी जिंदगियाँ मिलती है रोजानाहर जिंदगी जैसे है किताब का एक पन्नापर कहाँ मुनासिब

पापा हमारे लिए हैं भगवान

July 31, 2022

 पापा हमारे लिए हैं भगवान |papa hamare liye bhagwan hai हमारे पापा हमारे लिए हैं भगवान उनकी पनाह में रहना

अगर आप ईश्वर से थोड़ा डरते होते

July 22, 2022

 अगर आप ईश्वर से थोड़ा डरते होते  न करनी पड़े फरियाद हमें  अगर आप ऐसे होते  न करनी पड़े नफ़रत

किसी की सफलता को ना दो निर्भरता का नाम!

July 22, 2022

 किसी की सफलता को ना दो निर्भरता का नाम! सफलता किसी के दम पर जीती नहीं जाती, पर कुछ लोगों

सहमा-सहमा आज| sahma sahma aaji

July 20, 2022

 सहमा-सहमा आज कौन पूछता योग्यता, तिकड़म है आधार । कौवे मोती चुन रहे, हंस हुये बेकार ।। परिवर्तन के दौर

मनमीत रे करनी हैं तुझ संग प्रीत रे | manmeet re karni hai tujh sang Preet re

July 15, 2022

 मनमीत रे करनी हैं तुझ संग प्रीत रे  मनमीत रे करनी हैं तुझ संग प्रीत रे  जाने है हम तू

PreviousNext

Leave a Comment