Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Bhawna_thaker, lekh

“श्रृंगार या सौभाग्य”

 “श्रृंगार या सौभाग्य” भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर रुचि जो एक कार्पोरेट जगत में मल्टीनेशनल कंपनी में सीईओ की पोजीशन पर …


 “श्रृंगार या सौभाग्य”

भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर
भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर

रुचि जो एक कार्पोरेट जगत में मल्टीनेशनल कंपनी में सीईओ की पोजीशन पर नौकरी कर रही थी, उसकी शादी एक पढ़े लिखे रईश खानदान के लड़के आकाश से हुई। एक महीना शादी के बाद की रस्मों में और हनीमून में चला गया, छुट्टियाँ भी ख़त्म हुई, सब अपने अपने काम पर लग गए। रुचि भी सुबह उठकर फाॅर्मल पैंट शर्ट और ब्लेज़र पहनकर तैयार होकर ऑफ़िस जाने के लिए निकल ही रही थी की उसकी सास आँखें चौड़ी करते कुछ कड़वे लहजे में बोली, ये क्या बहू ये किस तरह के कपड़े पहन रखें है? उपर से न साज, न श्रृंगार, न माथे पर बिंदी, न मांग में सिंदूर, न गहने लत्ते कौन कहेगा तू नई-नई ब्याहता है? यूँ विधवा की तरह चल दी, लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे। और मेरे बेटे की तो सोच तेरे श्रृंगार पर उसका भाग्य टिका है, अपने पति की ज़िंदगी की तो कम से कम परवाह कर, सुहागन की सूनी मांग अपशगुन कहलाता है। हाथों की चूड़ी और हरीभरी मांग पति की आयु को लंबी बनाते है। आजकल की लड़कियां आधुनिकता के नाम पर परंपरा को ही भूलती जा रही है।

रुचि आज तो जल्दी में थी तो बिना कोई प्रतिक्रिया दिए सासु माँ के पैर छूकर शाम को मिलती हूँ कह कर अपनी गाड़ी लेकर निकल गई। पूरे रास्ते सोचती रही की क्या सच में मैं पढ़े लिखे आधुनिक विचारधारा वाले परिवार की बहू हूँ? क्यूँ सासु माँ की बातों से अठारहवीं सदी वाले विचारों की बू आ रही है। अगर आज इस विचारधारा के आगे झुक कर ऐसी दकियानुसी बातों का मैंने खंडन नहीं किया तो इन परंपराओं का तो पालन करना होगा, साथ में मुझे कमज़ोर समझते और भी लादी जाएगी, और मैं 21वीं सदी की पढ़ी लिखी लड़की हूँ कोई गाँव की गंवार नहीं जो बिना सर पैर वाली परंपरा निभाते समाज में एक गलत उदाहरण पेश करूँ। माँ को समझना होगा मुझे।  

छुट्टी के बाद काम का पहला दिन था तो रात को रुचि देर से घर आई इसलिए कोई बात नहीं हुई। दूसरे दिन भी यही सुनाने का सिलसिला चालू रहा तो रुचि ने कहा माँ फ़िलहाल आपकी एक भी बात का जवाब देने का मेरे पास समय नहीं, हम संडे को आराम से बात करते है। उस पर तो सासु माँ को अपना अपमान लगा, और घर में बहू के ख़िलाफ़ मोर्चा निकाल दिया। बहू तो आते ही अपनी मनमानी करने लगी है, न खानदान की इज्जत की परवाह न परंपरा का सम्मान, क्या फ़ायदा ऐसी पढ़ाई लिखाई का। आकाश ने कहा माँ शांत रहिए रुचि ने कहा न संडे को बात करेगी। उस पर भी सासु माँ भड़क गई तू मेरा बेटा हो ही नहीं सकता एक महीने में जोरू का गुलाम बन गया, दो शब्द बहू को बोल नहीं सकता। आकाश सहज स्वभाव का था बस हल्का सा मुस्कुराते सर घूमाते चला गया। रुचि हर रोज़ सासु माँ के पैर छूकर आशिर्वाद लेकर ऑफ़िस जाती। सासु माँ कुछ कहने को मुँह खोलते तो रुचि बोल देती माँ रविवार को। सासु माँ रविवार के इंतज़ार में तिलमिला रही थी। 

रुचि को सासु माँ से कोई शिकायत नहीं थी उसको लगता था दो पीढ़ी का अंतर मात्र है समझा लूँगी। रविवार को मातुश्री सुबह सात बजे नहा धोकर सोफ़ा पर विराजमान हो गए। बार-बार घड़ी की ओर देखते कुछ बड़बड़ा लेते थे, पर छुट्टी थी तो रुचि आराम से 9 बजे उठी, नहा धोकर नास्ता करके दिवानखंड में आई। सुंदर साड़ी, गले में मंगलसूत्र, बिंदी और पूरी मांग भरी हुई सज-धज कर परी सी लग रही थी। आते ही माँ के पैर छुए और गले मिलते बोली कहिए माँ कैसी लग रही हूँ? सासु माँ क्या बोले जैसी चाहते थे वैसी बहू सामने खड़ी थी तो बोले हर रोज़ ऐसे ही नखशिख सज-धज कर रहो तभी घर की लक्ष्मी लगोगी और मेरे बेटे की भाग्यलक्ष्मी। 

अब रुचि ने मामला अपने हाथ में लेते कहा ठीक है माँ जैसी आपकी मर्ज़ी, कल से मैं ऐसे ही साज श्रृंगार करके आपके सामने घर में शोभा की पुतली बनकर रहूँगी। पर मेरी कुछ बातों पर आप भी गौर कीजिए।  

माँ पहले तो एक बात समझ लीजिए कि मैं जैसे भी रहूँ इस घर की लक्ष्मी ही हूँ। महीने के लाखों रुपये कमाती हूँ तो हुई न लक्ष्मी? अरे माँ आपके बेटे की फ़िक्र मुझसे ज़्यादा और किसे होगी बताईये? मेरे तो जीने का सहारा ही आकाश है उनका बुरा सोच भी नहीं सकती। क्या मेरा सज-धज कर रहना ही ये साबित करेगा की मेरे पति की मुझे कितनी परवाह है, कितनी चिंता है? उनका, मेरा और हम सबका भविष्य संवारने के लिए नौकरी करती हूँ। पर माँ ऑफ़िस में इस तरह से तैयार होकर सज-धज कर जाना अलाउड नहीं होता। मैं खुद बाॅस हूँ नियम नहीं तोड़ सकती, नौकरी पर मुझे फार्मल कपड़े पहनकर ही जाना होगा। आप कहे तो नौकरी छोड़ दूँ, हर रोज़ साड़ी श्रृंगार में आपके सामने घूमा करूँगी। और माँ आज साड़ी, बिंदी, सिंदूर में सुंदर लग रही हूँ तो ये सारे स्त्रियों के श्रृंगार के साधन है जो मैंने किए इसलिए ज़्यादा सुंदर लग रही हूँ, इसे भाग्य सौभाग्य और पति के आयुष्य के साथ जोड़ कर बहूओं पर अत्याचार मत कीजिए, उन्हें अपनी पसंद से जीने दीजिए। छुट्टी के दिन जब मुझे सजने संवरने का मन करेगा तब सजने के नाम पर सारा श्रृंगार करूँगी बस, परंपरा और अंधविश्वास के नाम पर मुझसे यह उम्मीद मत रखिएगा। क्यूँकि मैं नहीं मानती की मेरी मांग भरने से आकाश की आयु बढ़ेगी पर हाँ स्वस्थ जीवन शैली से आयु अचूक बढ़ सकती है तो उस मामले में मैं आकाश के खान-पान और एक्सरसाइज़ का पुरा ध्यान रखूँगी। 

उसे आर्थिक रुप से अपना सहयोग देते उनके भाग्य परिवर्तन में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहूँगी और हर इंसान की उम्र सीमा तय होती है, किसीके मांग भरने से किसीकी आयु नहीं बढ़ती। अगर ऐसा ही होता तो हर रोज़ पूरी मांग भर कर सज-धज कर रहने वाली औरतों के पति की तो कभी मृत्यु ही नहीं होती। न मेरे सज-धज कर रहने से आकाश का भाग्य बदल जाएगा। उनका भाग्य मेरा फार्मल कपड़े पहनकर ऑफ़िस जाने से बेशक बदल सकता है। आप मैं और हम सब अच्छा जीवन जी सकेंगे। तो अब बताईये मैं सज-धज कर घर में बैठी रहूँ या फार्मल कपड़े पहनकर ऑफ़िस जाया करूँ?

अब सासु माँ की सिट्टी पिट्टी गुल थी, क्या बोले बहू की बात तो सही थी। लाखों रुपये कमा कर लाएगी तभी भाग्य बदल सकता है, और बहू के इतने उच्च विचार है, मेरा सम्मान करती है, हर रोज़ पैर छूकर घर से निकलती है कितनी खुशी है। और फिर मैंने तो पूरी ज़िंदगी मांग, भरी सज-धज कर श्रृंगार करती रही, करवा चौथ का व्रत रखा फिर भी आकाश के पापा दो साल पहले स्वर्ग सिधार गए। समाज के डर से मैं अपनी बेटी समान बहू को परंपरा के नाम पर क्यूँ प्रताड़ित करूँ, बहू को बहू न समझकर बेटी क्यूँ न समझूँ। क्या फ़र्क पड़ता है अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहने और अपनी पसंद से ज़िंदगी जिएं। सासु माँ ने कान पकड़ते कहा बेटी मेरी आँखों पर परंपरा के नाम पर झूठी पट्टी पड़ी थी, और समाज के डर से तुझसे वो सब करवाना चाहती थी जिसको ज़िंदगी भर निभाते भी होनी को नहीं टाल सकी। जी ले बेटा अपनी मर्ज़ी से बस ऐसे छुट्टियों में सज-धज कर रहना, सुंदर लगती है। रुचि ने कहा बेशक माँ मुझे भी सजना संवरना अच्छा लगता है आपकी खुशी के लिए पक्का हर रविवार को शोभा की पुतली बनकर रहूँगी और सासु माँ ने बहू को गले लगा लिया।

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर


Related Posts

रंगत खोते हमारे सामाजिक त्यौहार।

November 10, 2023

रंगत खोते हमारे सामाजिक त्यौहार। बाजारीकरण ने सारी व्यवस्थाएं बदल कर रख दी है। हमारे उत्सव-त्योहार भी इससे अछूते नहीं

पीढ़ी के अंतर को पाटना: अतीत, वर्तमान और भविष्य को एकजुट करना

November 8, 2023

पीढ़ी के अंतर को पाटना: अतीत, वर्तमान और भविष्य को एकजुट करना पीढ़ी का अंतर एक कालातीत और सार्वभौमिक घटना

करवाचौथ: वैज्ञानिक विश्लेषण

October 31, 2023

करवाचौथ: वैज्ञानिक विश्लेषण कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ कहते हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां अपने

करवा चौथ में चाँद को छलनी से क्यों देखते हैं?

October 31, 2023

करवा चौथ में चाँद को छलनी से क्यों देखते हैं? हिन्दू धर्म में अनेक त्यौहार हैं, जिन्हें भक्त, पूरे श्रद्धाभाव

परिवार एक वाहन अनेक से बढ़ते प्रदूषण को रेखांकित करना जरूरी

October 31, 2023

परिवार एक वाहन अनेक से बढ़ते प्रदूषण को रेखांकित करना जरूरी प्रदूषण की समस्या से निपटने सार्वजनिक परिवहन सेवा को

सुहागनों का सबसे खास पर्व करवा चौथ

October 30, 2023

सुहागनों का सबसे खास पर्व करवा चौथ 1 नवंबर 2023 पर विशेष त्याग की मूरत नारी छाई – सुखी वैवाहिक

PreviousNext

Leave a Comment