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शुक्र मनाओ भारत में पैदा हुए हो

 “शुक्र मनाओ भारत में पैदा हुए हो” भारत की विचारधारा को न अपना कर, पढ़ाई के बदले जिनको हिजाब पर …


 “शुक्र मनाओ भारत में पैदा हुए हो”

शुक्र मनाओ भारत में पैदा हुए हो

भारत की विचारधारा को न अपना कर, पढ़ाई के बदले जिनको हिजाब पर अटके रहना है, उनको अफ़घानिस्तान की महिलाओं की हालत पर गौर करने की जरूरत है। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई, एक तरफ़ लड़कियां हवाई जहाज उड़ा रही है वहाँ दूसरी तरफ अनपढ़, ज़ाहिल, गंवारों जैसी सोच रखने वाले तालिबानियों ने फ़रमान जारी किया कि पुरुष संरक्षक के बिना महिलाएं हवाई यात्रा नहीं कर सकतीं। यह लोग होते कौन है महिलाओं की आज़ादी पर बंदीश लादने वाले? और कौनसी सदी में जी रहे हैं। महिलाएं क्या इनके हाथों की कठपुतली है? जो जब चाहा फ़रमान जारी कर दिया। अचानक से एयरपोर्ट पर कुछ महिलाओं को जब ये फ़रमान मिला तब इनमें से कई महिलाओं के पास दोहरी नागरिकता थी और वे कनाडा समेत विदेश स्थित अपने घर लौट रही थीं। एक अधिकारी ने बताया कि हुक्म तालिबान नेतृत्व से आया है। पश्चिमी हेरात प्रांत में काफी जद्दोजहद के बाद कुछ महिलाओं को एरियाना एयरलाइंस की उड़ान में बैठने की अनुमति मिली, लेकिन तब तक विमान रवाना हो चुका था। सोचिए उन महिलाओं पर क्या बीती होगी।

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन धीरे-धीरे अपनी पुरानी विचारधारा थोपने के मूड़ में आ रहा है। तालिबान वहां रोज़ नए-नए फरमान जारी कर रहा है। खासकर वहां की महिलाओं के लिए लगातार सख्त नियम बन रहे हैं। इसी कड़ी में तालिबान के एक आधिकारिक आदेश में यह ऐलान किया गया है कि अफ़घानिस्तान में महिलाएं बिना पुरुष या कोई रिश्तेदारों के फ्लाइट में सफ़र नहीं करेगी। इसका सीधा मतलब हुआ कि तालिबान ने पुरुषों के बिना महिलाओं के फ्लाइट में सफ़र करने पर पाबंदी लगा दी है। तालिबानियों ने अफ़घानिस्तान पर बीते साल के अगस्त महीने में कब्ज़ा किया था। जिससे वहां की पश्चिम समर्थित सरकार गिर गई। इसी के बाद से ये देश महिलाओं और लड़कियों के लिए नरक बन गया है। इन्हें ना केवल स्कूल और कॉलेज जाने से रोका जा रहा है, बल्कि नौकरी करने तक की आजादी छीन ली गई है। साथ में रैप और दमनकारी नीतियों से भी प्रताड़ित किया जा रहा है।

पिछले साल अगस्त में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद पहली बार लड़कियां  कक्षाओं में पढ़ने गईं, लेकिन नया आदेश मिलने के बाद आंसुओं के साथ अपना बस्ता थामें घर वापस लौट गईं।

तालिबान ने 1996 से 2001 से अफगानिस्तान पर शासन किया था और उस दौरान भी देश में शरिया (इस्लामिक कानून) लागू करने के चलते महिलाओं के काम करने व लड़कियों की पढ़ाई पर पाबंदी लगा दी गई थी। महिलाओं व लड़कियों को उस वक्त भी बिना किसी पुरुष के अकेले घर से बाहर जाने पर  रोक लगा दी गई थी। अब तालिबान के दोबारा वही नियम लागू करने की नीयत दिखाई दे रही है।

अफ़घानिस्तान के तालिबान शासन ने लड़कियों की उच्च स्कूली शिक्षा पर रोक लगाने का फैसला किया है, जिसके तहत छठी कक्षा से ऊपर के स्कूलों में लड़कियों को जाने की अनुमति नहीं मिलेगी। बिना पढ़ाई के क्या करेगी लड़कियां? ये किस तरह की मानसिकता है। महिलाएं और लड़कियां क्या भेड़ बकरी है जो फ़रमान की लाठी चलाते उनकी ज़िंदगी की दिशा को बदलने की कोशिश कर रहे है। सच में यह एक दु:खद और शोषण करने वाली विचारधारा है। दुनियाभर के 16 देशों की महिला विदेश मंत्रियों ने शुक्रवार को कहा कि वे अफ़घानिस्तान की लड़कियों को माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने की अनुमति नहीं दिए जाने को लेकर ‘बहुत निराश हैं’ और उन्होंने तालिबान से अपने इस फ़ैसले को बदलने की अपील की है। पर क्यूँ वहाँ की महिलाएं आवाज़ नहीं उठाती? क्यूँ वहाँ का पुरुष वर्ग चुप है, क्यूँ इतने ज़ुर्म सह रहे है? किसी भी इंसान को दूसरे इंसान की आज़ादी छीनने का और किसीकी ज़िंदगी में दखल अंदाज़ी देने का कोई हक नहीं होता। क्या यहाँ पर हिजाब पर बवाल मचाने वाले अफ़घानिस्तान में होते तो अपने ही मुल्क में ऐसी बातों पर विद्रोह करने की हिम्मत कर पाते। शुक्र मनाओ भारत में पैदा हुए हो जहाँ बंदीशें लादी नहीं जाती बल्कि थोपी गई जबरदस्ती की कुप्रथाओं के विरूद्ध आवाज़ उठाने की आज़ादी मिलती है। पर जो ऐसी गलत परंपरा का अनुकरण करने की आदी बन गई हो उनका कुछ नहीं हो सकता। 

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर 

भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर


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