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kishan bhavnani, poem

व्यंग्य कविता-मेरी ऊपर तक पहुंच है| meri upar tak pahunch hai

व्यंग्य कविता-मेरी ऊपर तक पहुंच है अच्छों अच्छों को अपने झांसे में लाता हूं जो सियानें बनते हैं उनको ठगियाता …


व्यंग्य कविता-मेरी ऊपर तक पहुंच है

अच्छों अच्छों को अपने झांसे में लाता हूं
जो सियानें बनते हैं उनको ठगियाता हूं
अपनी सुपरपोजिशन दिखियाता हूं
मेरी ऊपर तक पहुंच है बोलता हूं

सभी उम्मीदवारो पर पासा फेकता हूं
जो झांसे में आए हरे गुलाबी लेता हूं
घुमा फिराकर बातूनी पटकनीं देता हूं
मेरी ऊपर तक पहुंच है बोलता हूं

ऊपर वाले से फोन कर बात करवाता हूं
वह मेरा ही फंटर है राज़ नहीं बताता हूं
उम्मीदवारी सहित जीत पक्की सपने दिखाता हूं
मेरी ऊपर तक पहुंच है बोलता हूं

शासकीय काम घर बैठे करवाता हूं
ठास्के से हरे गुलाबी अधिक मात्रा में लेता हूं
सबसे ऊपर नहीं सिर्फ ऊपर फुटाने तुल्य देता हूं
मेरी ऊपर तक पहुंच गए दिखाता हूं

सबसे ऊपर की पहुंच हर ऑफिस में बोलता हूं
उनके लेवल की फाइल आगे बढ़वाता हूं
उसके आगे पहुंच की धौंस दिखाता हूं
मेरी ऊपर तक पहुंच है बोलता हूं

About author

Kishan sanmukh

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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