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Jayshree_birmi, poem

लाऊं तो कैसे और कहां से-जयश्री बिरमी

लाऊं तो कैसे और कहां से कहां से लाऊ वो उत्साह जो हर साल आता थाकहां से लाऊं वह जोश …


लाऊं तो कैसे और कहां से

लाऊं तो कैसे और कहां से-जयश्री बिरमी

कहां से लाऊ वो उत्साह जो हर साल आता था
कहां से लाऊं वह जोश जो हर साल आता था
तैयारी करते थे मनाने की जो नया साल
केक व खानी पीनी की बनती लंबी सूची हर हाल
वही सूची बनती थी अपनों और दोस्तों की
नहीं रहे बाकी कोई वरना उम्र भर सुनाएगा
अब कहां से लाऊं वो जजबा
सभी तो डरते हैं एकदूजे से जो कभी कसके मिलते थे
नहीं मिलेगी वो पाके जाफियां
जालिम जमाने छीन ली हैं नजदीकियां
अब सोचूं कि किस को बुलाऊं नए साल के जश्न में
कैद कर रखा हैं हमे इस शैतानी वक्त ने
अब क्रूर करोना के भाई की भी बारी हैं आई
उठ करोना अब ओमिक्रॉन की बारी हैं आई
मिलेंगे अब कैसे अपनों से इस भयंकर काल में
छूटे जा रहे हैं हसीन लम्हे जिंदगी के इस जंजाल में
पालन करने में दो गज की दूरी और मास्क के व्यवहार में
लाऊं कहां से……..???

जयश्री बिरमी
अहमदाबाद
निवृत्त शिक्षिका


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