Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

Jayshree_birmi, Laghukath

लघुकथा मां- जयश्री बिर्मी

 लघुकथा  मां- बहुत ही पुरानी बात हैं,जब गावों में बिजली नहीं होती थी,मकान कच्चे होते थे,रसोई में चूल्हे पर खाना …


 लघुकथा  मां-

लघुकथा मां- जयश्री बिर्मी

बहुत ही पुरानी बात हैं,जब गावों में बिजली नहीं होती थी,मकान कच्चे होते थे,रसोई में चूल्हे पर खाना बनता था और सुख सुविधा के नाम पर एक चार पाई बिछी रहती थी।साल में एक ही बार दर्जी घर में आके पूरे साल के कपड़े सील जाता था।

 ऐसी सादगी की जिंदगी हुआ करती थी।उन्ही दिनों की बात हैं,एक गांव में मास्टरजी  अपने छ: बच्चे और बीमार पत्नी के साथ  रहते थे। एक कमरा ,रसोई घर और बड़ा सा औंसारा ये था उनका कच्चा सा घर।पढ़ाने जाने से पहले खाना बना के जाते थे और घर के बाकि के काम वह बच्चों की मदद से कर लिया करते थे।वैसे बहुत मुश्किल था ऐसी गृहस्थी निभाना पर  निभ रही थी जैसे तैसे।

   वैद्यजी हफ्ते में इक दिन घर आके उनकी पत्नी को दवाई दे जाते थे।उस दिन भी वैद्यीजी आए तो मास्टरजी ने थोडी उदासी से पूछ ही लिया,कब तक ऐसा चलेगा? कब ठीक होगी उनकी पत्नी? वैद्यजी सिर हिला अनिश्चितता बयान कर गए।उन से बीमार पत्नी का क्षीण शरीर चारपाई पे पड़ा देखा नहीं जाता था। न तो उनमें उठ ने की शक्ति थी न ही कुछ काम करने की।

 मास्टरजी रात को खाना खा ओंसारे में खटियां पर सो जाते थे और बच्चे कमरे में नीचे बिस्तर बिछा सो जाते थे,ये रोज ही का क्रम था।

 एक दिन बच्चे बिस्तर पे लेट गए थे ,उन्हों ने लालटेन की लौ कम की और खुद बाहर औंसारे में आ अपनी खटियां पे सो गए। आधी रात को कहीं से एक साप कमरे में आया बच्चे तो नीचे सो रहे थे तो मास्टरनी जी से देखा नहीं गया और  बड़ी मुश्किल से उठ कोने में पड़ी लाठी उठा साप को बड़े ही जनून से पिट पिट के मार दिया और वहीं बेसुध हो गिर पड़ी,बच्चे भी उठ सहमे से कोने में खड़े हो गए ।मास्टरजी ने आवाजे सुनी तो दौड़ के कमरे में आए और देख हैरान से रह गए।उनकी पत्नी जो उठ ने में कई सालों से  असमर्थ थी वह साप को मार बेसुध पड़ी थी।

 मास्टरजी ने बड़े बेटे को भेज वैद्यजी को बुलावा भेजा।थोड़ी देर में वैद्यजी आए तब तक मास्टरजी ने बच्चों के साथ मिल मास्टरनीजी को चारपाई पर लिटा दिया था। वैद्यजी ने आकर नाड़ी देख बताया कि कमजोरी और डर की वजह से होश खो बैठी थी चिंता की कोई बात न थी।किंतु वैद्यजी भी हैरान थे कि वह उठ कैसे पाई। उनके हिसाब से उसमे इतनी ताकत थी ही नहीं,वह ताकत कैसे  आई  समझ नहीं पा रहे थे।  वैसे बच्चो से ज्यादा मां के लिए दुनियां में कुछ भी यानि की कुछ भी नहीं यह साबित हो गया था।मास्टरनी जी जो कई सालों से बिस्तर पर कंकाल सी पड़ी थी बच्चों की ओर आते साप को देख कैसे उठ पड़ी उन्हें खुद को पता नहीं चला था। मां तो मां ही होती हैं ।

जयश्री बिर्मी
अहमदाबाद


Related Posts

बच्चो की बदलती मानसिकता

March 5, 2023

बच्चो की बदलती मानसिकता ये मेरा अपना अभिप्राय है जो इतने साल गृहस्थी चलाने से और शिक्षण कार्य के दौरान

मानवता पर लेख| manavta

February 16, 2023

मानवता पर लेख कईं रसों से हमारा ह्रदय समृद्ध है।सब रस बहुत ही आवकारदायक है।जैसे प्रेम,जिससे मानव सहृदय बनता है,

यात्रा का दौर | yatra ka daur

February 5, 2023

यात्रा का दौर कश्मीर से कन्याकुमारी पैदल? या अक्ल से।जनता को दुखी करने का प्रयास या खुद तंग होने के

नाक लीला | Nak leela

February 5, 2023

नाक लीला हमें भगवान ने सुंदर शरीर तो दिया ही है,साथ में उन्हे ऋतुओं के प्रहार से बचाने के उपाय

सामाजिक सरोकार | samajik sarokar

January 29, 2023

सामाजिक सरोकार जीव मात्र सामाजिक प्राणी हैं,उन्हे साथ चाहिए ये बात पक्की हैं।उसमे चाहें कौए हो या चिड़िया सब अपनों

अनकही चीखें ( गर्भपात)

January 28, 2023

अनकही चीखें आज मैं अपनी बेटी के क्लिनिक में बैठ उसके काम को बड़े ध्यान से देख रहा था।कुछ सगर्भा

Leave a Comment