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राजनीति

राजनीति ऐ बाबू , ये तो पब्लिक है सब जानती है, ये तो पब्लिक है संभावनाओं और आंकड़ों का खेल …


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ऐ बाबू , ये तो पब्लिक है सब जानती है, ये तो पब्लिक है

संभावनाओं और आंकड़ों का खेल है राजनीति – एडवोकेट किशन भावनानी

गोंदिया – आदिअनादि काल से ही भारत और भारतमाता की गोद में जन्मे हर मनीषी जीवों के भाव परोपकारी और सेवाभावी रहे हैं। हम सेवाकार्य करने के विश्वास रखते हैं और यह सेवाकार्य अनेक क्षेत्रों में आज भी जारी है। अखंड भारत में राजा प्रजा की प्रथा में भी प्रजा की सेवा को सर्वाधिक माना जाता था। वर्ष 1947 में भारत की आजादी के बाद यहां लोकतांत्रिक प्रथा स्थापित हुई और भारत का पहला आम चुनाव 1951 में हुआ था, जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जीता था, एक राजनीतिक दल जो 1977 तक बाद के चुनावों पर हावी रहा, जब स्वतंत्र भारत में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। साथियों बात अगर हम राजनीति की करें तो, राजनीति दो शब्दों का एक समूह है राज+नीति। (राज मतलब शासन और नीति मतलब उचित समय और उचित स्थान पर उचित कार्य करने की कला) अर्थात् नीति विशेष के द्वारा शासन करना या विशेष उद्देश्य को प्राप्त करना राजनीति कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जनता के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर (सार्वजनिक जीवन स्तर)को ऊँचा करना राजनीति है।
साथियों बाद अगर हम भारतीय लोकतंत्र और सरकार की करें तो, संविधान के अनुसार,भारत एक प्रधान,समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतांत्रिक राज्य है, जहां पर विधायिका जनता के द्वारा चुनी जाती है। अमेरिका की तरह, भारत में भी संयुक्त सरकार होती है, लेकिन भारत में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है, जो कि ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर आधारित है। बहुमत की स्थिति में न होने पर मुख्यमंत्री न बना पाने की दशा में अथवा विशेष संवैधानिक परिस्थिति के अंतर्गत, केन्द्र सरकार राज्य सरकार को निष्कासित कर सकती है और सीधे संयुक्त शासन लागू कर सकती है, जिसे राष्ट्रपति शासन कहा जाता है। भारत की पूरी राजनीती मंत्रियों के द्वारा निर्धारित होती है। भारत एक लोकतांत्रिक, धार्मिक और सामुदायिक देश है। जहां युवाओं में चुनाव का बढ़ा वोट केंद्र भारतीय राजनीति में बना रहता है यहां चुनाव को लोकतांत्रिक पर्व की तरह बनाया जाता है। भारत में राजनीतिक राज्य में नीति करने की तरह है।
साथियों बात अगर हम जनप्रतिनिधियों के पक्ष की वेकन्सी की करें तो, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, ग्राम सभा या स्थानीय निकायों में जनप्रतिनिधियों के कितने पद होते हैं, लोकसभा (545) और राज्यसभा (245) मिलाकर 790 (इनमें से 14 मनोनीत), विभिन्न राज्यों के लिए विधायक (एमएलए), विधान परिषद (एमएलसी) के 4574 से भी ज्यादा और ग्राम सभा या स्थानीय निकायों में प्रधानी (मुखिया), वार्ड पार्षद, जिला परिषद, नगर निगम/परिषद के देशभर में लाखों पद हैं। अगर इन पदों पर शिक्षित, प्रशिक्षित, नैतिकवान और सेवाभाव रखने वाले युवा जाएं तो निश्चित ही देश, राज्य और पंचायत की स्थिति बदलेगी।

साथियों बात अगर हम राजनीति की संभावनाओं और आंकड़ों के खेल की करें तो हमने वर्ष 2019 में महाराष्ट्र में इसका खेला!! देखें कि किस तरह आधी रात में सरकार बनी फिर इस्ती़फा!! फिर अन्य दलों की मिलकर सरकार बनी और फिर अभी पिछले महीने में आंकड़ों का खेला!! और फिर एक नई सरकार बनी। इसी तरह बिहार में चुनाव हुए, आंकड़ों का खेला!! सरकार बनी, इस्तीफा!! और फिर अब कुछ दिन पूर्व नई सरकार बनी, सब आंकड़ों का खेला!! उसी तरह दो सालों से हम देख रहे हैं कि किस तरह पीएम पद के बनाम में किस तरह एकजुटता!, बिखराव!! सामंजस्य!!! फ़िर टूटना, फिर सीएम का 2024 के पीएम पद के लिए नाम चलना हो रहा है!! अभी वह चर्चा आगे चल पाती इस बीच वर्तमान में ही कल से जनता देख रही है सीबीआई की रेड के बाद फिर पीएम पद के दावेदार नए नाम की बात आ गई है और सशक्त उम्मीदवार बताकर चर्चाएं हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में की जा रही है और कोई दूर से देख कर 1974 में आई फिल्म रोटी का यह गाना कह रहा है रहा है, ऐ बाबू, ये तो पब्लिक है यह सब जानती है ये तो पब्लिक है, अजी अंदर क्या है, अजी बाहर क्या है ये सब कुछ पहचानती है ये पब्लिक है ये सब कुछ जानती है।

साथियों बात अगर हम अपने बचपन में सुनी राजनीति, जवाबदारी और राजनीतिक सेवा भाव की करें तो, लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 1956 में महबूबनगर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत हुई थी। इस पर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया। इसे तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार नहीं किया। तीन महीने बाद ही अरियालूर रेल दुर्घटना में 114 लोग मारे गए। उन्होंने फिर इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इस्तीफा स्वीकारते हुए संसद में कहा था कि वह इस्तीफा इसलिए स्वीकार कर रहे हैं कि यह एक नज़ीर बने। इसलिए नहीं कि हादसे के लिए किसी भी रूप में शास्त्री जिम्मेदार हैं।
साथिया बात अगर हम जनता के मन की करें तो जनता अपेक्षा करती है कि, चुनाव के समय कोई पार्टी जनता के बीच रही है, तो उसे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचना चाहिए और सही मुद्दों के साथ चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। वो मुद्दे जिसका सीधा संबंध जनता से है, जैसे बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था आदि। अगर आप सत्तारुढ़ पार्टी का सही विकल्प बनने के लिए जनता को समझाने में कामयाब रहते हैं तो जनता आपको जरूर वोट देगी। क्योंकि जनता को असल मुद्दों से मतलब हैं मनोरंजन से नहीं। वादा किया है तो उसे निभाना होगा
साथियों यह तो नहीं कहा जा सकता कि किसी भी पार्टी ने अपनी सरकार में सभी वादों को पूरा किया है, लेकिन कुछ पार्टियों ने अधिकतम वादों को पूरा करके उन्होंने जनता के बीचलोकप्रियता हासिल की है। जैसे यूपी में सरकार ने कुछ हद तक कानून व्यवस्था को ठीक किया है तथा राज्य की जनता के लिए कई लोक कल्याणकारी स्कीम चलाई, तो वहीं एक पार्टीपार्टी ने दिल्ली के लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करके इसी मॉडल का पंजाब में खूब प्रचार किया और जनता से भरोसा हासिल किया। ऐसे में 2022 का चुनाव यह दिखाता है कि अगर आप जनता से कुछ वादे करते हैं, तो उसे जरूर निभाएं। नहीं तो जनता अगली बार आपको सत्ता से बाहर कर देगी।
साथियों जनता अपने क्षेत्र और देश के विकास के बारे में जानना चाहती है। क्षेत्र या देश की मजबूती के लिए किसी पार्टी की क्या योजना है, उसके बारे में जनता को बताना जरूरी है। अगर जनता को लगा कि आप केवल सत्ता में आने के लिए और गिने चुने लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, तो जनता आपको कभी वोट नहीं देगी। आपके पास क्षेत्र या देश के विकास का ब्लू प्रिंट होना चाहिए। और इसे आप जनता के बीच ले जाइए और उन्हें समझाइए। इससे जनता के बीच आपकी पार्टी पर भरोसा होगा और वह आपको वोट भी देंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि राजनीति – ऐ बाबू, ये तो पब्लिक है ये सब जानती है ये तो पब्लिक है , संभावना और आंकड़ों का खेल है राजनीति।

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Kishan sanmukh

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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