Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

यादें – जयश्री बिरमी

 यादें दिवाली तो वो भी थी जब ऑनलाइन शुभेच्छाएं दी थी हमने और एक ये भी हैं जब रूबरू हैं …


 यादें

yaadein by jayshree birmi

दिवाली तो वो भी थी

जब ऑनलाइन शुभेच्छाएं दी थी हमने

और एक ये भी हैं जब रूबरू हैं सभी

बनाई थी बहुत मिठाइयां भेजने के लिए 

अबकी खायेंगे सब मिलकर

पूजा भी की थी बिल्कुल तन्हा 

अबकी मिल के केरेंगे पाठ लक्ष्मी जी का

खूब बिरहा सह ली  हैं हमने

अब तो दिन मिलन के आ गएं हैं

खूब मिलेंगे सभी से पर दोस्तों भूलना नहीं हैं करोना के रिवाज

बेमुर्रव्वत हैं ये मुड़ मुड़ के आता हैं

हाथ धो लो

मास्क पहन लो और रखो थोड़ी दूरियां

अच्छी हैं ऐसी दूरी,

वरना याद करो वो मजबूरियां

तरस गए थे बाहर आने को

चूहे जैसे दिन कटते थे

बाहर आओ खाना बटोरों

घर वाले बिल में घुस जाओ

अब अगर जीना हैं बन के मानव

बस करोना काल के अनुशासन का पालन करों

जयश्री बिरमी (jayshree Birmi)
अहमदाबाद


Related Posts

अकेली होती कहां

June 24, 2022

 अकेली होती कहां डॉ. इन्दु कुमारी मेरे तो सब साथी  मैं अकेली होती कहां  हवा से भी बातें करती  पेड़

जल संरक्षण

June 24, 2022

 जल संरक्षण डॉ. इन्दु कुमारी जल ही जीवन है जीवन के संजीवन है इसे बचाना पुण्य कार्य  यही असली जनसेवार्थ।

लहरों से दोस्ती महंगी पड़ी हुज़ूर ज्वार उठा ऐसा की तैरना जानते हुए भी शख्सियत मेरी किनारे लगी

June 23, 2022

 “लहरों से दोस्ती महंगी पड़ी हुज़ूर ज्वार उठा ऐसा की तैरना जानते हुए भी शख्सियत मेरी किनारे लगी” भावना ठाकर

कितना कठिन होता है ना? माँ होना

June 23, 2022

 कितना कठिन होता है ना? माँ होना सिद्धार्थ गोरखपुरी बचपने से सबको खुश कर देना और जवां होना। बस उँगलियों

कविता – छाँव सा है पिता

June 23, 2022

 कविता – छाँव सा है पिता सिद्धार्थ गोरखपुरी गलतफहमी है के अलाव सा है पिता घना वृक्ष है पीपल की

कविता -आँखें भी बोलती हैं

June 23, 2022

 कविता -आँखें भी बोलती हैं सिद्धार्थ गोरखपुरी न जीभ है न कंठ है कहने का न कोई अंत है दिखने

PreviousNext

Leave a Comment