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माँ की महिमा

“माँ की महिमा” जिस कोख में नौ महीने रेंगते मैं शून्य से सर्जन हुई उस माँ की शान में क्या …


“माँ की महिमा”

भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर
जिस कोख में नौ महीने रेंगते मैं शून्य से सर्जन हुई उस माँ की शान में क्या लिखूँ, लिखने को बहुत कुछ है पर आज बस इतना ही लिखूँ कि, लिखी है मेरी माँ ने अपनी ममता की स्याही से मेरी तकदीर, रात-रात भर जाग कर मेरी ख़ातिरदारी में अपनी नींद गंवाई है कहो कैसे कह दूँ की मैं कुछ भी नहीं”

“माँ को दिल में जगह न दो ना सही पड़ी रहने दो घर के एक कोने में पर वृध्धाश्रम की ठोकरें मत खिलाओ माँ की जगह वहाँ नहीं” कैसे कोई अपनी जनेता के साथ ऐसा व्यवहार कर सकता है, जिसकी कोख में नौ महीने रेंगते बूँद में से तीन चार किलो का पिंड बना हो, जिनके खून का एक-एक कतरा पीकर पला बड़ा हो उस माँ को वृध्धाश्रम की ठोकर खाने के लिए छोड़ते कलेजे पर करवत नहीं चलती होगी?
मातृ दिवस पर त्याग की मूर्ति को चंद शब्दों में ढ़ालकर कृतघ्नता व्यक्त कैसे करें कोई? माना कि एक दिन पर्याप्त नहीं होता माँ के गुणगान गाने के लिए, पर जिसने भी मातृ दिवस मनाने का ये चलन या परंपरा बनाई उनको कोटि-कोटि धन्यवाद। अगर ये खास दिन नहीं होता तो हम माँ के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करने से बिलकुल चूक जाते। कम से कम इसी बहाने माँ के नि:स्वार्थ त्याग को सराहने का हमें मौका तो मिलता है। बाकी तो माँ से हम लेनदार की तरह लेते ही रहते है।
बच्चों के लिए उपर वाले ने दिया अनमोल उपहार और ज़िंदगी के रंगमंच का एक अहम किरदार होती है माँ। माँ चाहे अनपढ़ ही क्यूँ न हो अपने बच्चों को जीवन जीने का हर सबक सिखाती है। संस्कारों के गहनों से सजाती है, किताब महज़ ज्ञान पाने का ज़रिया है, पर माँ अपने बच्चों को किताबों में छिपी ज़िंदगी की असली हकीकत का सार समझाते हर चुनौतियों से अवगत कराते सक्षम योद्धा बनाती है। ज़िंदगी गाथा है संघर्षों की उस गाथा का भार हल्का कैसे हो उस राह पर ऊँगली पकड़ते ले जाती है।
क्या लिखें क्या-क्या होती है माँ? शक्ति और सहनशीलता का स्त्रोत, परम्परा और आधुनिकता का अभूतपूर्व संगम, जीवंतता और निर्लेपता का विलक्षण रुप, एक गतिशील भाव, धर्म और कर्म का सुविचारित मिश्रण और बच्चों के लिए कुछ भी कर गुज़रने का जज़्बा होती है माँ।
होते है बच्चें टहनी से नाजुक उनको बेहतरीन बरगद बनाती है माँ, ईश्वर की रचना से अन्जान बालक को प्रार्थना के ज़रिए अमूर्त रुप से मिलवाती है माँ..माँ, माँ है, माँ गुरु है, माँ पिता है और माँ सखा भी है, ज़िंदगी के आत्मबोध से लेकर मृत्युबोध की महिमा भी समझाती है। पास बिठाकर गले लगाकर बच्चों के झरने से अडोल मन में संस्कारों का सागर सिंचती है, बच्चों के भविष्य को जो झिलमिलाता बनाता है वह रोशनी का टुकड़ा है माँ और ज़िंदगी के हर रंगों से बच्चों को रुबरु करवाता कैनवास है।
अपने बच्चों की हर गलती को माफ़ करने का मशीन होती है माँ।
माँ का कोई पर्याय नहीं, जब नहीं रहती तब ज़िंदगी में एक शून्यावकाश छा जाता है, ऐसा लगता है जैसे ज़िंदगी की चुनौतियों से लड़ने का हथियार चला गया हो। माँ बच्चों के जीवन की बुनियाद होती है, जीवन सफ़र की राहबर होती है माँ के बिना संसार ही अधूरा है। माँ का दिल कभी मत दुखाना, बच्चों के लिए माँ की मांगी दुआ उपरवाले की चौखट तक अचूक पहुँचती है। जब दिल दुखता है तब माँ बच्चों को बद दुआ कभी नहीं देती, पर जब एक माँ की आह निकलती है तो ईश्वर की आत्मा रोती है और उस रुदन का असर न हो ऐसा हो ही नहीं सकता।

 
भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर

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