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महिला लेखिकाओं की विडम्बना

“महिला लेखिकाओं की विडम्बना” भले आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हो पर हमारे समाज में महिला लेखिकाओं …


“महिला लेखिकाओं की विडम्बना”

भले आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हो पर हमारे समाज में महिला लेखिकाओं को बहुत सारी विडम्बनाओं का सामना करना पड़ता है। इतिहास गवाह है अम्रिता प्रितम हो, परवीन शाकिर हो, कृष्णा सोबती हो या विदेशी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ हो जिसने भी लेखन के ज़रिए आवाज़ उठानी चाही समाज ने उसे दबाना चाहा। औरतों को आक्रोश उड़ेलने का जैसे कोई हक ही नहीं
खास कर पुरुष लेखकों के बीच खुद को सक्षम रुप से प्रस्थापित करना मुश्किल होता है। वो इसलिए कि हमारा समाज आज भी स्त्रियों के प्रति उतनी उदारवादी निति नहीं रखता। महिलाओं के लिए एक सीमा तय कर दी जाती है। पहले तो घर का माहौल ही महिलाओं को आगे बढ़ने पर तंज कसता है, महिला की बुद्धि का अंदाज़ा नहीं लगाते और सोचते है की लिखना औरतों का काम नहीं। और फिर महिलाओं को घर परिवार देखते जो समय बचता है उस समय को एडजस्ट करते लेखन के लिए समय निकालना पड़ता है। और जैसे ही लिखने बैठती है कि घरवालों की भौहे तन जाती है। कोई प्रेम से नहीं कहता की जा अपना शौक़ पूरा कर ले। कुछ महिला लेखिकाएं सक्षम होने के बावजूद उस दायरे से निकल कर लिखने से हिचकिचाती है। और लिखती भी है तो कुछ विषयों से दूरी बनाकर, जैसे राजकारण पर, वेश्यावृत्ति पर और सेक्स जैसे विषयों से परे रहती है। और कुछ शब्दों का चयन करने से घबराती है, सेक्स के उपर लिखने से घबराती है, पति पत्नी के अंगत रिश्ते पर या ऐसे किसी भी विषय पर लिखने से कतराती है। ये सोचकर की मेरा इस विषय पर लिखा अगर घरवाले या मेरे पति पढ़ेंगे तो क्या सोचेंगे। और सच में कुछ शंकाशील पतियों को अपनी लेखिका पत्नियों द्वारा लिखे ऐसे लेखों पर ऐतराज भी होता है। इसी वजह से बहुत सी लेखिकाएं मुखर होने से डरती है, और जो आज़ाद ख़यालों वाली मुखर होकर लिखती है तब समाज की नाराज़गी का शिकार होते बहुत कुछ सहती है।
और शृंगार रस पर जितना खुलकर पुरुष लेखक लिख लेते है उतना महिलाएं नहीं लिख पाती, यहाँ भी वही विडम्बना कि लोग क्या सोचेंगे। चुम्बन शब्द में जैसे करंट छिपा हो, उन्नत उरोज लिखना जैसे पाप हो या प्रेम की चरम का वर्णन जैसे निम्न कक्षा का लेखन हो गया। खास कर ये सब जब एक महिला लिखती है तो लोगों की आँखें निकल आती है। ये मुद्दा भी मैं तो कहूँगी स्त्री विमर्श का हिस्सा ही माना जाए। जब माँ सरस्वती का वरदान किसी पर होता है तभी कोई चार पंक्तियाँ लिख पाता है, तो महिला लेखिकाओं का पूरा सम्मान होना चाहिए। माना कि लज्जा स्त्री का गहना होता है पर उस गहने को घुटन बना लेना गलत है।
कई लेखिकाएं घरवालों से छुप छुपकर लिखती है या कोई ओर नाम या पहचान बनाकर लिखती है। इस मसले पर इतना ही कहूँगी की इसमें घरवालों का कम जो दमन सह रही है उसका दोष ज़्यादा है। लेखन कोई ऐसा काम तो नहीं जिस पर शर्मिंदा हो या छुप-छुपकर करना पड़े। ये कायरता है अपने हक अस्तित्व के लिए किड़े मकोड़े भी लड़ते है। एक लेखक होकर ऐसी मानसिकता सहन करना बिलकुल गलत बात है। लेखक का काम होता है गलत के विरुद्ध आवाज़ उठाना समाज को जगाना फैली हुई बदी को उजागर करके समाधान की दिशा में ले जाना। इसलिए शुरुआत खुद से होनी चाहिए। वरना ऐसे खोखले विचार लिखने का मतलब क्या है। दबने और डरने वालों को दुनिया कमज़ोर समझती है। अपने हक के लिए और सच के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। लेखक को बेख़ौफ़ और बेबाक होना चाहिए।
मैं ये कहूँगी कि अगर आप एक सच्चे लेखक है तो शर्म, संकोच और डर को त्याग कर बिंदास अपने विचार लिखने की हिम्मत करनी चाहिए। शब्दों की मर्यादा में रहकर हर मुद्दे को उजागर करते लिखना हर लेखक का अधिकार है, वो चाहे स्त्री हो या पुरुष। पर महिलाओं को मुखर होने में और समाज को इस सोच को अपनाने में शायद अभी कुछ समय ओर लगेगा। महिला लेखिकाओं का जीवन संघर्षों से टकराता ही मिलेगा।

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भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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