Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel
महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से जागरूक रही

lekh, Nandkishor shah

महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से जागरूक रही

महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से जागरूक रही पर्यावरण शब्द का चलन नया है, पर इसमें जुड़ी चिंता …


महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से जागरूक रही

पर्यावरण शब्द का चलन नया है, पर इसमें जुड़ी चिंता नई नहीं है। वह भारतीय संस्कृति के मूल में रही है। आज पर्यावरण बचाने के नाम पर बाघ, शेर, हाथी आदि जानवरों, नदियों, पक्षियों, वनों आदि सबको बचाने के लिए विश्वव्यापी स्वर उठ रहें है। भारत में प्राचीन काल से पर्यावरण की तत्वों को धार्मिक कलेवर में समेत कर उनके संरक्षण एवं संवर्धन को एक सुनिश्चित आधार प्रदान किया गया है। महाभारत में कहा गया है कि वृक्ष रोपने वाला उनके प्रति पुत्रवत आत्मीयता रखता है। एक वृक्ष अनेक पुत्रों के बराबर होता है। महाभारत में पीपल की पत्तियों तक को तोड़ना मना है। भारतीय मानवीय मूल्यों में वृक्षों को व्यर्थ काटना माना है। मनु स्मृति निर्देश देती है कि गांव की सीमा पर तालाब या कुएं बावड़ी कुछ न कुछ अवश्य बनाना चाहिए। साथ ही वट, पीपल, नीम या शाल एवं दूध वाले वृक्षों को भी लगाना चाहिए। किसी ग्राम में फूल व फलों से युक्त यदि एक भी वृक्ष दिखाई दे तो वह पूज्यनीय होता है। प्राचीन मूर्तियों में अशोक वृक्ष की पूजा क्रिया अंकित मिलती है। अर्थ वेद के अनुसार जहां पीपल और बरगद के पेड़ होते हैं। वहां प्रबुद्ध लोग रहते हैं। वहां क्रीमी नहीं आते। कृष्ण पवित्र अक्षय वट वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान मग्न हुए थे। इसकी छाया जहां जहां तक पहुंचती है तथा इसके संघर्ष से प्रवाहित जल जहां तक पहुंचता है, वह क्षेत्र गंगा के समान पवित्र होता है। पीपल मानव जीवन से जुड़ा वृक्ष है। लंबे जीवन का प्रतीक है, क्योंकि यह दीर्घायु होता है। बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य हिंदीभाषी राज्यों में उपनयन संस्कार के समय इसकी भी पूजा होती है। सामाजिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों को देखें तो यह पता चलता है कि प्राचीन काल से ही महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रही हैं। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज भी महिलाओं द्वारा पर्व-त्योहार के अवसर पर पूजा अर्चना में अनेक वृक्षों यथा- पीपल, तुलसी, अमला, बेर, नीम आदि वृक्षों एवं विभिन्न पशु तथा गाय, बैल, चूहा, घोड़ा, शेर, बंदर, उल्लू आदि को सम्मिलित करना एवं उनकी पूजा-अर्चना के माध्यम से संरक्षण प्रदान करना देखने को मिल जाता है। सुहागिनी वट अमावस्या व्रत की पूजा के बाद वटवृक्ष की पुजा करती हैं। आदिवासियों में विवाह के समय महुआ के पेड़ पर सिंदूर लगाकर वधू अटल सुहाग का वरदान लेती है और आम के पेड़ को प्रणाम कर सफल वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। इस प्रकार, महिलाऐं विभिन्न रूपों में पर्यावरण की संरक्षण करती आ रही हैं। जंगलों के विनाश के विरुद्ध सफल आंदोलन के रूप में पूरी दुनिया में चिपको आंदोलन सराह जा चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस आंदोलन का संचालन करने वाली महिलाएं पहाड़ी व ग्रामीण क्षेत्रों की रहने वाली निरीक्षर एवं अनपढ़ महिलाएं थी। आज पढ़े-लिखे लोग भी पूर्वजों के लगाए पेड़ पौधों को काटने से नहीं हिचकिचाते हैं। यह गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा है। जिंदगी भर मनुष्य लकड़ी से बने समानों का उपयोग करता है, किंतु पेड़ नहीं लगता है। यह चिंतनीय है। पेड़ लगाएंगे तो फल मिलेगा, आज नहीं तो कल मिलेगा।

About author

डॉ. नन्दकिशोर साह

डॉ. नन्दकिशोर साह
ईमेल- nandkishorsah59@gmail.com


Related Posts

14 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2022

June 27, 2022

आओ मिलकर मानवीय जीवन को सुगम बनाएं 14 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2022 ब्रिक्स देशों के आपसी सहयोग से अनेक क्षेत्रों

नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस 26 जून 2022 पर विशेष

June 27, 2022

 नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस 26 जून 2022 पर विशेष  नशीली दवाओं के दुरुपयोग

घर के बुजुर्ग उपेक्षित क्यों!

June 27, 2022

 घर के बुजुर्ग उपेक्षित क्यों! ये घर घर की कहानी हैं जो हरदम हम देख रहें हैं।लेकिन जिम्मेवार कौन,ये प्रश्न

ज्यादा सोचना बंद करते हैं!

June 27, 2022

ज्यादा सोचना बंद करते हैं! हम सभी चीजों के बारे में अपने दिमाग में बहुत गहरे उतारते हैं, और हम

अधिक कार्य कैसे करें!

June 27, 2022

 अधिक कार्य कैसे करें! कभी-कभी, हम चाहते हैं कि दिन में और घंटे हों। दुर्भाग्य से, हम समय को नियंत्रित

क्यों नारी को हीन बनाया बनाया गया!

June 24, 2022

क्यों नारी को हीन बनाया बनाया गया! Jayshree birmi जिस देश में नारी आदि काल से ही पूजी जा रही

Leave a Comment