Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

poem

मर्जी उसकी-डॉ हरे कृष्ण मिश्र

मर्जी उसकी पंख लगा उड़ने की इच्छा , मानव मन भी कर लेता है ,आशा और जिज्ञासा लेकर ,दूर गगन …


मर्जी उसकी

मर्जी उसकी-डॉ हरे कृष्ण मिश्र
पंख लगा उड़ने की इच्छा ,

मानव मन भी कर लेता है ,
आशा और जिज्ञासा लेकर ,
दूर गगन में उड़ लेता है। ।।

इच्छा मेरी नए मंच पर,
अभिनंदन उसका करलूं ,
सोच रहा हूं मैं भी लिखूं ,
अपने मन से कुछ पूछूं।

विषय वस्तु से बहुत दूर हूं ,
जिंदगी मेरी करवट लेकर,
दूर कहीं जा कर बैठी है ,
उसका भी अनुमोदन ले लूं। ।।

लिखना लगता बहुत सरल है ,
लिखने का अभ्यास कहां है ,
बैठा बैठा खुद ही अपनी ,
जिम्मेदारी से भाग रहा हूं ।।

उद्देश्य नहीं है लक्ष्य नहीं है ,
मैं जीवन को घेर रहा हूं ,
बड़े-बड़े नेताओं के बीच ,
सुंदर संभाषण कर लेता हूं ।।

चल गुजारे जिंदगी के छन ,
एक पवन का झोंका आया ,
शीतलता कुछ देने को ,
प्रकृति हमारी बहुत उदार ।।

कब तक ढोएं जिंदगी। ,
थाह पता मिलता नहीं ,
पीड़ा बढ़ गई इस तरह ,
कट नहीं पाती जिंदगी। ।।

लौकिकता की प्रेम कहानी ,
बहुत बड़ी है जीवन में ,
ईश्वर की तो बहुत कृपा है,
हम तो उसकी रचना हैं ।।

निर्णय तो उसका ही होगा ,
हम तो केवल मात्र उसी के ,
टूट गए गर हम जीवन में ,
यह निर्णय भी उसका है। ।।

समय कठिन तो आना था ,
तो होगी उसकी ही मर्जी ,
चिंतन करना फर्ज हमारा ,
कोई स्वीकार नहीं अर्जी ।।

मौलिक रचना
डॉ हरे कृष्ण मिश्र
बोकारो स्टील सिटी
झारखंड।


Related Posts

कैसे कोई गीत सुनाये-आशीष तिवारी निर्मल

January 6, 2022

कैसे कोई गीत सुनाये कितने साथी छूट गएसब रिश्ते नाते टूट गएपल-पल मरती आशाएंजब अपने ही लगें परायेकैसे कोई गीत

प्रणय जीवन- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

January 6, 2022

प्रणय जीवन प्रेम जीवन में प्रवाहित,प्रेम से जीवन जुड़ा है,प्रेम का परिणाम हम हैं,प्रेम को जीवन समर्पित ।। जिंदगी पर्याय

जीने का अनुराग नहीं – डॉ हरे कृष्ण मिश्र

January 6, 2022

जीने का अनुराग नहीं प्यासी है नदियां प्यासा है सावन,बर्षा की बेला प्यासा है चातक ,प्यासी है धरती प्यासा है

राधा की पीड़ा- डॉ हरे कृष्ण मिश्र

January 6, 2022

राधा की पीड़ा चल केशव बरसाना जाना,रूठ गयी जहां राधा रानी ,वृंदावन को भूल गयी है ,अपनों से भी रूठ

देर लगेगी- सिद्धार्थ गोरखपुरी

January 6, 2022

देर लगेगी बदल गया जमाना है…. जरा देर लगेगीन कोई ठौर ठिकाना है…..जरा देर लगेगीतुम होते जो कुत्ते! तो लेते

बताओ न कैसे रहते हो ?–सिद्धार्थ गोरखपुरी

January 6, 2022

सड़क किनारे रहने वाले ग़रीब बेघरों को समर्पित रचना-बताओ न कैसे रहते हो मौसम ठंडा सूरज मद्धमऊपर से बदन पर

Leave a Comment