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भारत की पड़ोस और विदेश नीति शांति-उन्मुख रही है

 भारत की पड़ोस और विदेश नीति शांति-उन्मुख रही है  भारत के पड़ोस में मची सियासी उठापटक और आर्थिक आपातकाल – …


 भारत की पड़ोस और विदेश नीति शांति-उन्मुख रही है 

भारत की पड़ोस और विदेश नीति शांति-उन्मुख रही है

भारत के पड़ोस में मची सियासी उठापटक और आर्थिक आपातकाल – रूस यूएनएचआरसी से सस्पेंड 

भारत की पड़ोस व विदेश नीति में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व व विश्व शांति की झलक मिलती है – एड किशन भावनानी 

गोंदिया – बड़े बुजुर्गों की कहावत है कि जब पड़ोस सुख-शांति हो तो इंसान चैन की नींद सोता है जब पड़ोसी के साथ-साथ हम भी शांति के पक्षधर हो!!! यह बात सिर्फ गली, मोहल्ले, जिले, प्रदेश, देश तक सीमित नहीं है बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे देशों पर भी सटीक बैठती है। 

साथियों इस कहावत को अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष में लेकर हमारे देश के पड़ोसियों नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान इत्यादि देशों से के बारे में लें, तो भारत भी पड़ोसी और विदेश नीति शांति-उन्मुख़ है तथा भारत की पड़ोस और विदेश नीति में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व व विश्व शांति की झलक मिलती है क्योंकि ऐतिहासिक विरासत के रूप में नीतियां आज अनेक तत्वों को समाहित किए हुए हैं जो कभी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से उपजी थी परंतु एक सच्चाई यह भी है कि ऐसा कोई निश्चित मापदंड नहीं है कि जिसके आधार पर किसी देश के पड़ोसी संबंधोंकी सफ़लता या असफ़लता का निर्णय किया जाए परंतु आज की स्थिति को देखते हुए जब हमारे एक पड़ोसी मुल्क जहां ख़ूब सियासी उठापटक मची हुई है उनके पीएम ने भी भारतीय विदेश नीति की तारीफ़ की जबकि उनसे तालमेल कुछ सुलझे हुए नहीं हैं जो पूरे विश्व ने सुना, तो हम कह सकते हैं कि भारत की पड़ोस और विदेश नीति दोनों पटरी पर हैं। 

साथियों बात अगर हम हमारे पड़ोसियों की विपत्तियों में सहायता की करे तो पूरे विश्व ने देखा भारत ने किस तरह वैक्सीन का वितरण अपने पड़ोसी देशों को कर उनके नागरिकों की जान बचाकर मानवता और अच्छे पड़ोसी का परिचय दिया और वर्तमान समय में भी एक पड़ोसी देश की आर्थिक हालत बद से बदतर हो गई है वहां भी भारत पड़ोसी और अच्छे मानवीय नाते के कारण मदद के हाथ बढ़ा रहा है। 

साथियों बात अगर हम विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता के मीडिया में आए बयान की करें तो श्रीलंका की अर्थव्यवस्था तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ती मुद्रास्फीति की दोहरी चुनौती का सामना कर रही है, जिससे यह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई है। वह लगातार ऋण स्तरों के साथ सॉल्वेंसी के मुद्दों का भी सामना कर रहा है। विदेशी मुद्रा की अभूतपूर्व कमी के कारण वहां के लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता। 

पेट्रोल पंपों के बाहर बड़ी कतारें हैं, क्योंकि पेट्रोल आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार नहीं है, फार्मेसियों में दवाएं खत्म हो गई हैं, जबकि अखबारों के घर अखबारी कागज से बाहर हो गए हैं। प्रवक्ता ने कहा, हम अपनी पड़ोस पहले नीति के अनुरूप तेजी से पोस्ट-कोविड आर्थिक सुधार के लिए उनके साथ काम करना जारी रखने के लिए तैयार हैं। हमारी तत्परता, जो भी सहायता हम प्रदान कर सकते हैं, वह अब तक हमारे कार्यो से प्रदर्शित हुई है। मार्च के मध्य से अब तक 2.70 लाख़ मीट्रिक टन से अधिक खाद्य और तेल उनको को पहुंचाया जा चुका है। इसके अलावा, हाल ही में विस्तारित एक अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन के तहत 40 हज़ार टन चावल की आपूर्ति की गई है।

भारत और श्रीलंका के बीच संबंध सहयोग हमारे सभ्यतागत मूल्यों और आकांक्षाओं में निहित हैं। हाल के महीनों में भारत-श्रीलंका संबंध मजबूत हुए हैं। श्रीलंका में पहले चार अप्रैल को आपातकाल का ऐलान किया गया था, जब आर्थिक संकट की वजह से जगह-जगह हिंसा शुरू हो गई थी, तब राष्ट्रपति ने स्थिति को काबू में करने के लिए इमरजेंसी लगाने का फैसला लिया था, लेकिन अब उसी आपातकाल वाले फैसले को रद्द कर दिया गया है, इसके पीछे के क्या कारण रहे हैं, ये अभी स्पष्ट नहीं है। वैसे अभी भी जमीन पर स्थिति काफी खराब बताई जा रही है। 

महंगाई चरम सीमां पर पहुंच चुकी है और लोगों के सब्र का बांध टूट रहा है। डीजल लेने के लिए लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं, केरोसीन के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है और कागज की किल्लत की वजह से बच्चों की परीक्षा रद्द करवा दी गई है। जमीन पर क्या स्थिति? अब ये राजनीतिक उठापटक इतनी तेज इसलिए हो गई है क्योंकि वहां स्थिति आउट ऑफ कंट्रोल होती जाती दिख रही है। वहां लंबे समय तक बिजली कटौती ने देश में संचार नेटवर्क को प्रभावित कर दिया है। भारी कर्ज और घटते विदेशी भंडार के कारण श्रीलंका ने अब आयात के लिए भुगतान करने में भी असमर्थ हो गया है। यही वजह है कि इससे देश में ईंधन सहित कई सामान की किल्लत हो गई है.  इस सब के ऊपर कोविड -19 महामारी ने वहां की अर्थव्यवस्था को भारी झटका दिया। सरकार ने पिछले दो वर्षों में14 बिलियन डॉलर के नुकसान का अनुमान लगाया हैं

साथियों बात अगर हम हमारे एक पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में मची सियासी उठापटक की करें तो वहां की सुप्रीम कोर्ट ने देर रात अपने फ़ैसले में नेशनल असेंबली को बहाल करते हुए डिप्टी स्पीकरके फैसलेको असंवैधानिक करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने 5-0 से फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति का नेशनल असेंबली को भंग करना गलत फैसला था। कोर्ट ने पीएम के साथ उनके मंत्रिमंडल को भी बहाल कर दिया। 

राजनीतिक संकट के बीच वहां के सुप्रीम कोर्ट ने माना कि डिप्टी स्पीकर का फैसला असंवैधानिक था। कोर्ट ने कहा है कि पीएम को 9 अप्रैल को सुबह 10 बजे नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ेगा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल असेंबली को बहाल कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगर अविश्वास प्रस्ताव सफ़ल होता है तो नए पीएम का चुनाव होना चाहिए। यह सुनवाई डिप्टी स्पीकर के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर हो रही थी, जिसमें केंद्र सरकार के खिलाफ़ आए अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था। इसके बाद ही पाकिस्तान की संसद को भी भंग कर दिया गया था और 90 दिनों के अंदर चुनाव कराने की मांग हुई थी।

साथियों बात अगर हम वैश्विक स्तरपर भारत के अच्छे संबंधों की करें तो उसमें रूस का भी नाम है जिसका दिनांक 7 अप्रैल 2022 को देर रात्रि, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से रूस को हटाने पर फैसला करने के लिए वोटिंग हो गई है। इसके लिए न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) का आपातकालीन विशेष सत्र हुआ। भारत ने यूएनएचआरसी से रूस को निलंबित करने के लिए मसौदा प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया। प्रस्ताव के पक्ष में 93 और विरोध में 24 वोट पड़े। 58 ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। इसके बाद यूएनजीए ने रूस को यूएनएचआरसी से निलंबित कर दिया गया है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारत की पड़ोस और विदेश नीति शांति-उन्मुख रही है।भारत के पड़ोस में मची सियासी उठापटक और आर्थिक आपातकाल!!!रूस यूएनएचआरसी से सस्पेंड!!भारत की पड़ोसी व विदेश नीति में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व व विश्व शांति की झलक मिलती है। 

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महा


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