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बेमानी- जयश्री बिरमी

बेमानी उम्रभर देखी हैं ये दुनियां की रस्मेंन ही रवायतें हैं निभाने की कसमेंजब भूले गए थे वादे और तोड़ी …


बेमानी

बेमानी- जयश्री बिरमी
उम्रभर देखी हैं ये दुनियां की रस्में
न ही रवायतें हैं निभाने की कसमें
जब भूले गए थे वादे और तोड़ी गई थी कसमें
वादें नहीं रहते हैं वादें
जब भुलाएं जाते हैं
जो मुकर जाते हैं वफा के मंजर से
उन्ही को मिलती ही वफाओं की कश्ती
जो निभाते हैं रस्मे वफा उन्ही को मिलते हैं भंवर
यादें,वादें और वफाएं हो जातें हैं बेमानी
जब अहम हो जाती हैं खुदगर्जी से वफ़ा 
डूब जाते हैं वफाओं के तलबगार
सीतमगर ही डुबोते हैं इश्क कश्तियां
सिर्फ बची रहती हैं खामोश इश्क की सिसकियां
खत्म हो जाता हैं बेजान इश्क ए जनून
फिक्र न तो फक्र भी कैसे करें
जो भूल जाएं उन्हे याद भी क्यों करें

जयश्री बिरमी

अहमदाबाद


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