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kanchan chauhan, poem

बुआ -भतीजी |kavita -bua bhatiji

बुआ -भतीजी बात भले फर्ज़ी लगे, लेकिन इस में सच्चाई है। बुआ होती है भतीजी का आने वाला कल, और …


बुआ -भतीजी

बुआ -भतीजी |kavita -bua bhatiji

बात भले फर्ज़ी लगे, लेकिन इस में सच्चाई है।
बुआ होती है भतीजी का आने वाला कल,
और भतीजी होती अपनी बुआ की परछाईं है।
बुआ के जैसे भतीजी भी तो ,
हो जाती एक दिन पराई है।
एक ही घर दोनों का मायका,
है एक ही घर की बेटी दोनों ,
नहीं कोई फर्क है दोनों में।
एक पापा की लाडली बेटी,
है दुसरी साथी बचपन की,
हर राखी पर रस्ता देखे पापा,
बुआ है रौनक त्यौहारों की।
भतीजी उसी आंगन की शोभा,

जिस में कभी बुआ खेली थी,
पापा की है वो प्यारी बहना,
भतीजी की प्यारी बुआ है,
कोई माने या न माने लेकिन,
भतीजी होती अपनी बुआ की परछाईं है।
बुआ होती है भतीजी का आने वाला कल
भतीजी होती है बुआ का बीता हुआ बचपन।
इसीलिए तो भतीजी होती, बुआ को प्यारी है।

About author

कंचन चौहान,बीकानेर

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