Follow us:
Register
🖋️ Lekh ✒️ Poem 📖 Stories 📘 Laghukatha 💬 Quotes 🗒️ Book Review ✈️ Travel

lekh, sneha Singh

बच्चों को अकेलापन न महसूस हो, इसके लिए मां-बाप को उन्हें हमेशा स्नेह देना चाहिए |

बच्चों को अकेलापन न महसूस हो, इसके लिए मां-बाप को उन्हें हमेशा स्नेह देना चाहिए उर्वी जब से कालेज में …


बच्चों को अकेलापन न महसूस हो, इसके लिए मां-बाप को उन्हें हमेशा स्नेह देना चाहिए

बच्चों को अकेलापन न महसूस हो, इसके लिए मां-बाप को उन्हें हमेशा स्नेह देना चाहिए | Parents should always give affection to children so that they do not feel lonely.

उर्वी जब से कालेज में गई थी, तब से देर से घर आने लगी थी। संजय और सीता छोटे से गांव से नौकरी के लिए नजदीक के शहर जाते थे। उर्वी और उमेश भी नजदीक के उसी शहर में पढ़ने जाते थे। स्कूल छूटने का समय और वैन का समय निश्चित था, इसलिए जब तक स्कूल जाते थे, तब तक दोनों समय से घर आ जाते थे। पर जब से दोनों कालेज जाने लगे थे, तब से यह समय अनियमित हो गया था। उमेश पिछले दो सालों से कालेज में था और उर्वी इसी साल से कालेज जाने लगी थी। कालेज का समय दोपहर तक था, इसलिए शाम तक तो घर पहुंचा जा सकता था। पर इधर काफी समय से उर्वी देर शाम तक घर आने लगी थी। तब तक उसके मम्मी-पापा घर आ गए होते थे और थोड़ा-बहुत खाना भी बन गया होता था, इसलिए उर्वी खाना खा कर कापी-किताब लेकर पढ़ने बैठ जाती थी। उसने घर में बातें करना काफी कम कर दिया था। संजय और सीता नौकरी से थके होते थे। आने पर घर का काम भी होता था और कंटाला भी, इसलिए उनका ध्यान बच्चों की ओर कम होता था और अपने सवालों पर ज्यादा होता था। उनकी चर्चाएं झगड़े तक पहुंच जातीं और थक कर सभी अपनी-अपनी दुनिया में खो जाते।
पर उमेश का ध्यान अपनी बहन की ओर हमेशा रहता। उर्वी क्या करती है, कब आती है, कब जाती है, इसकी चिंता उसे हमेशा रहती। पिछले कुछ दिनों से उर्वी देर से आने लगी तो वह बाहर खड़े हो कर उसका इंतजार करने लगा। आने पर वह पूछता भी, “आज किस का लेक्चर था, आने में इतनी देर क्यों हो गई?”
पर उर्वी उसके सवालों के उल्टे-सीधे जवाब दे कर अपने काम में लग जाती। परेशान हो कर उमेश उर्वी का पीछा करने का निश्चय किया। फिर तो उर्वी कालेज जाती तो उमेश भी उसके पीछे-पीछे जाता और उसके कालेज के बाहर खड़ा रहता। थोड़ी-थोड़ी देर में वह अंदर जा कर देख भी आता और जब छुट्टी होती तो थोड़ा अंतर बना कर वह उसका पीछा करता।
उर्वी की हकीकत जान कर उमेश हैरान था। उर्वी कालेज की छुट्टी होने के बाद बस डिपो पर दो घंटा अकेली ही बैठी रहती। उसकी सहेलियां भी चली जातीं। ऐसा भी नहीं था कि वह किसी लड़के या सहेली की राह देख रही होती। फिर भी वह दो घंटे तक अपने यहां जाने वाली बसों को जाने देती और लगातार दो घंटे तक डिपो पर बैठी रहती। कुछ दिनों तक लगातार पीछा करने के बाद उमेश की समझ में आ गया कि उर्वी किसी गलत काम के लिए या किसी गलत सोहबत के लिए समय बरबाद नहीं करती। पर जान बूझ कर समय बरबाद करने के लिए बस डिपो पर बैठी रहना कहां तक ठीक था। उसने उर्वी से पूछा, “तुम ऐसा क्यों करती हो? पिछले काफी दिनों से मैं देख रहा हूं कि तुम घर देर से आने के लिए बस डिपो पर बैठी रहती हो। ऐसा करना ठीक नहीं है। वहां सब लोग अच्छे नहीं होते। कभी कोई खराब आदमी तुम्हें परेशान कर सकता है। तुम ऐसा क्यों करती हो, कालेज से सीधे घर क्यों नहीं आती?”
उर्वी थोड़ी घबराई। फिर उसने खुद को संभाल कर कहा, “भाई मैं वहां खुशी-खुशी नहीं बैठी रहती। पर जो तुम कह रहे हो कि घर जल्दी आ जाओ तो जल्दी घर आ कर क्या करूं? मम्मी-पापा थक कर आते हैं और एक-दूसरे से लड़ने लगते हैं। लड़ने में उन्हें थकान नहीं लगती। पर मुझे लगती है। जल्दी घर आ कर लड़ाई-झगड़ा देखने की अपेक्षा देर से घर आना ठीक नहीं है? पर तुम मेरी चिंता मत करो। मैं अपनी तरह से अपना ध्यान रखती हूं। बस, यह कालेज की डिग्री मिल जाए, हायर एजुकेशन के लिए मैं हास्टल में चली जाऊंगी। जिससे घर के झगड़े में पड़ना न पड़े।
सामान्य रूप से मां-बाप भूल जाते हैं कि उनका व्यवहार उनके बड़े हो रहे बच्चों पर खासा असर करता है। वैज्ञानिक शोध द्वारा सबूत मिले हैं कि जो मां-बाप हमेशा बच्चों के सामने लड़ते-झगड़ते रहते हैं, उनके बच्चों का विकास कम होता है और उनमें डर, हीनभावना या डिप्रेशन जल्दी देखने को मिलता है। बच्चे मां-बाप को अपना आदर्श मानते हैं और जब इनका व्यवहार बच्चों को भी गैरवाजिब लगता है, तब वे क्या करें, उनकी समझ में नहीं आता। वे परेशान होते हैं और कभी-कभी गलत आदमी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। परिस्थिति से भागने का प्रयत्न करते हैं। और फिर घर से दूर होते जाते हैं। अगर बच्चा अकेला पड़ता है तो उसे आपराधिक तत्व तुरंत घेर सकते हैं, इसलिए मां-बाप को समझना चाहिए कि उनके बीच के आंतरिक प्रश्न बच्चों के सामने कभी न आएं, इस बात का खास ख्याल रखना जरूरी है। कुछ भी हो, बच्चों के सामने उन्हें प्यार से रहना चाहिए। उर्वी भाई के साथ और स्नेह के कारण गलत सोहबत में जाने से बच गई। बाकी कोई हमेशा यह देख रहा है कि वह घर से दूर भाग रहा है तो उसे पकड़ने में देर नहीं लगती और इसीलिए ऐसे आपराधिक तत्वों को शिकार मिल रहे हैं। उर्वी ने जब घर में बात की तो उमेश ने उसे वचन दिया कि भले ही मम्मी-पापा को समझ आने में देर लगेगी, पर अब वह उसका हमेशा साथ देगा और उर्वी ने भी कहा कि वह जब भी अकेलापन महसूस करेगी, उमेश से बात करेगी।
संक्षेप में बच्चे अकेलापन न महसूस करें, इसके लिए उन्हें मां-बाप को हमेशा स्नेह देना जरूरी है। प्यार जरूरी है। इतना ही नहीं, उनके सामने कभी न ऊंची आवाज में बात करें और न झगड़ा करें और जब बच्चों को लगे कि घर में रहने लायक नहीं है तो उन्हें यह बात मां-बाप से कहनी चाहिए। मां-बाप को भी तुरंत अपना व्यवहार सुधारना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि गलती हमेशा बच्चे ही करते हैं, मां-बाप भी गलत हो सकते हैं।

About author

Sneha Singh
स्नेहा सिंह

जेड-436ए, सेक्टर-12

नोएडा-201301 (उ.प्र.) 

Related Posts

यूनिफॉर्म सिविल कोड का आगाज़ | introduction of uniform civil code

June 17, 2023

यूनिफॉर्म सिविल कोड का आगाज़ – कंसल्टेशन प्रक्रिया शुरू यूनिफॉर्म सिविल कोड का आगाज़ | introduction of uniform civil code

रक्तदान जीवनदान है | World Blood Donor Day

June 13, 2023

रक्तदान जीवनदान है🩸 पुराणों में कहा गया है कि मानव सेवा ही सच्चे अर्थों में ईश्वर की सेवा है ।

वो सुप्रभात संदेश जिसने झकझोरा | the good morning message that shook

June 13, 2023

वो सुप्रभात संदेश जिसने झकझोरा जैसी ही सुबह हुई सभी के सुप्रभात के संदेश देख अंतर्मन को एक तृप्ति सी

अखंड भारत – अविभाजित भारत की परिकल्पना

June 13, 2023

अखंड भारत – अविभाजित भारत की परिकल्पना नए संसद भवन में अखंड भारत के नक्शे नुमा म्युरल आर्ट को लेकर

दूसरों कि थाली का खाना पसंद

June 13, 2023

दूसरों कि थाली का खाना पसंद, दूसरों को भी आपकी थाली का खाना पसंद अरे-अरे क्यों नाराज़ होते अगर कोई

विश्व बालश्रम निषेध दिवस 12 जून 2023 पर विशेष

June 11, 2023

विश्व बालश्रम निषेध दिवस 12 जून 2023 पर विशेष – 17 वां वार्षिक वेबीनार आयोजित आओ बच्चों को बालश्रम की

PreviousNext

Leave a Comment