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बच्चों के खिलौने -कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

 बच्चों के खिलौने  खिलौने हमारे देश की सभ्यताओं सांस्कृतिक विरासत को समझने में मदद करते हैं प्लास्टिक खिलौनों के बढ़ते …


 बच्चों के खिलौने 

बच्चों के खिलौने -कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

खिलौने हमारे देश की सभ्यताओं सांस्कृतिक विरासत को समझने में मदद करते हैं

प्लास्टिक खिलौनों के बढ़ते प्रचलन को रोककर स्वदेशी शिल्प, स्वदेशी खिलौनों के उपयोग को बढ़ावा देने की ज़रूरत – एड किशन भावनानी 

गोंदिया – विश्व में कहीं भी अगर हम खिलौने की बात करें तो अनायास ही बच्चों की काया उभर आती है!!! खिलौनों को अक्सर बच्चों से संबंधित ही समझा जाता है लेकिन वर्तमान परिपेक्ष में इस शब्द का प्रयोग विस्तृत स्तर पर होता है, यहां तक कि हिंदी अंग्रेजी फिल्मों के नाम भी खिलौना हो चुके हैं। 

साथियों बात अगर हम खिलौनों की भारतीय पावन धरती पर करें तो भारत में खिलौनों का प्रयोग अतिप्राचीन और सिंधु सभ्यता के खंडहरों से भी प्राप्त हुए हैं अगर हम सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों को देखेंगे तो हमें बोध होगा कि यह हमारी प्राचीन विरासत और सभ्यता से जुड़े हैं। लेकिन हम देखते हैं कि समय के घूमते चक्र ने किस तरह परिस्थितियां बदल कर रख दी और हम सब प्रौद्योगिकी युग में आ गए!!! जहां हर कार्य,व्यवहार डिजिटल हो गया है वहां भला खिलौने क्यों पीछे रहें!!! आज खिलौने इस तरह से डिजिटल हो गए हैं, जो पूरी तरह ऑटोमेटिक और प्लास्टिक निर्मित हो गए हैं जो वातावरण के पूर्णता खिलाफ और नुकसान पैदा करने वाले हैं जिन्हें रोकना अत्यंत आवश्यक है उससे नुकसान की हमने कल्पना भी नहीं की हैं!! 

साथियों बात अगर हमारे स्वदेशी शिल्प, स्वदेशी कला से संजोए खिलौने की करें तो उसमें हमारे देश की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति झलकती है उसे देखकर, उनसे खेलकर आनंद महसूस होता है। उनमें हमारे पूर्वजों की कारीगरी के गुणों का आभास प्रतीत होता है!!! हमारे भारतीयता की शान हैं। उनके उत्पादन, संग्रहण, बिक्री के लिए उच्च मापदंडों की रणनीतिक रोडमैप नीति बनाने की ज़रूरत है क्योंकि आज भी हमारी सभ्यता,विरासत के खिलौने विलुप्त  नहीं हुए हैं। ग्रामीण स्तरपर पारंपरिक समुदायों द्वारा आज भी बनाए जाते हैं जिसे हम अनेक त्योहारों पर देखते हैं जैसे महाराष्ट्र में पोले के अवसर पर लकड़ी की कारीगरी से बैल का शेप दिया जाता है और छोटे-छोटे बच्चे मर्बोद के दिन घरों, दुकानों पर उसे ले जाकर बौजारा याने अपना पुरस्कार मांगते हैं जो बहुत ही प्राचीन सभ्यता का प्रतीक है जिसे देख कर खुशी होती है। ऐसे ही अनेक अवसरों पर अन्य राज्यों में भी हस्तशिल्पी कारीगरों का प्रचलन होता है जिसे एक प्लेटफार्म प्रदान कर वैश्विक स्तर पर ले जाने की तात्कालिक ज़रूरत है। 

साथियों बात अगर हम देश के पहले इंडिया टॉय फेयर 2021 की करें तो पीआईबी के अनुसार इसके उद्घाटन समारोह में माननीय पीएम ने भी कहा था, खिलौनों के साथ भारत का रचनात्मक रिश्ता, क्रिएटिव सम्बन्ध, उतना ही पुराना है जितना इस भूभाग का इतिहास है। सिंधुघाटी सभ्यता, मोहनजो -दारो और हड़प्पा के दौर के खिलौनों पर पूरी दुनिया ने रिसर्च की है। प्राचीन काल में दुनिया के यात्री जब भारत आते थे, वो भारत में खेलों को सीखते भी थे, और अपने साथ खेल लेकर भी जाते थे। आज जो शतरंज दुनिया में इतना लोकप्रिय है, वो पहले ‘चतुरंग या चादुरंगा’ के रूप में भारत में खेला जाता था। आधुनिक लूडो तब पच्चीसी के रुप में खेला जाता थाI हमारे धर्मग्रन्थों में भी आप देखिए, बाल राम के लिए अलग-अलग कितने ही खिलौनों का वर्णन मिलता है। गोकुल में गोपाल कृष्ण घर के बाहर अपने मित्रों के साथ कंदुक यानी बॉल से खेलने जाते थे। हमारे प्राचीन मंदिरों में भी खेलों के, खिलौनों के शिल्प को उकेरा गया है। खासकर के तमिलनाडु में, चेन्नई में, अगर आप वहाँ मंदिरों को देखेंगे, तो ऐसे कितने ही उदाहरण देखने को मिलेंगे कि मंदिरों में भी अलग-अलग खेल, अलग-अलग खिलौने, वो सारी चीजें वहाँ आज भी दीवारों पर दिखती हैं। 

साथियों बात अगर हम दिनांक 20 जनवरी 2022 को खिलौने और खेल खेलने, बनाने और सीखने पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार की करें तो पीआईबी के अनुसार मुख्य अतिथि शिक्षा राज्यमंत्री  ने भी अपने संबोधन में बच्चों के बौद्धिक विकास और उनमें रचनात्मकता पैदा करने और समस्या को सुलझाने के कौशल को निखारने में खिलौनों की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सीखने-सिखाने के संसाधन के रूप में खिलौनों में अध्यापन कला को बदलने की क्षमता है और खिलौना आधारित शिक्षण का उपयोग माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को सिखाने के लिए आसानी से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि खिलौने हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत को समझने में मदद करते हैं और बौद्धिक व भावनात्मक विकास को मजबूती प्रदान करते हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह अंतरराष्ट्रीय वेबिनार हमारे देश के आत्मनिर्भर होने की यात्रा को सुगम बनाएगा और देश के आर्थिक विकास में योगदान देगा।

अपने संबोधन में वेबिनार की समन्वयक और लैंगिक अध्ययन विभाग, एनसीईआरटी की प्रमुख ने इस बात को रेखांकित किया कि खिलौने हमेशा भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। उन्होंने प्लास्टिक के खिलौनों के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताई, जिसका पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव होता है। उन्होंने ग्रामीण और स्वदेशी शिल्प को बढ़ावा देने और स्वदेशी खिलौनों के उद्योग को बढ़ावा देने के महत्व को रेखांकित किया और बच्चों के दुनिया के बारे अलग तरह से सोचने, पुनर्विचार और कल्पना शक्ति को मजबूत करने के लिए खिलौना आधारित शिक्षण पद्धति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के प्रति लोगों की जबर्दस्त प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया और इसका विवरण साझा किया। 

पहला तकनीकी सत्र विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में खिलौनों पर आधारित था। इसमें पांच पेपर थे जो विभिन्न विषयों पर खिलौनों और खेलों की परंपरा पर प्रस्तुत किए गए और इसमें इतिहास से उदाहरण लेकर आज के दिन से जोड़ा गया।दूसरा तकनीकी सत्र खिलौनों के साथ विभिन्न अवधारणाओं को सीखना, खिलौना आधारित शिक्षण कला पर केंद्रित था। इस सत्र की अध्यक्षता किम इंस्ले, एसोसिएट प्रोफेसर (शिक्षण), पाठ्यक्रम विभाग, शिक्षण कला एवं मूल्यांकन विभाग, शिक्षा संस्थान, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन ने की। इस सत्र में शिक्षकों और शिक्षकों के प्रशिक्षकों ने अपने अनुभव साझा किए। 

खिलौना डिजाइन शिक्षा, पाठ्यक्रम और करियर, पर केंद्रित तीसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता रवि पवैय्या, प्रोफेसर, औद्योगिक डिजाइन केंद्र, आईआईटी बॉम्बे, मुंबई ने की। विभिन्न डिजाइन संस्थानों के संकाय सदस्यों और एक उद्यमी ने देश में खिलौनों के डिजाइन एजुकेशन पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने खिलौना आधारित शिक्षण पद्धति की दिशा में काम करने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग का आह्वान किया। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बच्चों के खिलौने हमारे देश की सभ्यताओं, सांस्कृतिक विरासत को समझने में मदद करते हैं तथा प्लास्टिक खिलौनों के बढ़ते प्रचलन को रोककर स्वदेशी शिल्प, स्वदेशी खिलौनों के उपयोग को बढ़ावा देने की ज़रूरत है। 

-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र


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